Monday, January 16, 2017

बहुत तेजी से हमारे बच्चे इस मुक्तबाजार की चकाचौंध में आत्मध्वंस की तरफ बढ़ रहे हैं।


बहुत तेजी से हमारे बच्चे इस मुक्तबाजार की चकाचौंध में आत्मध्वंस की तरफ बढ़ रहे हैं।
पलाश विश्वास
बहुत तेजी से हमारे बच्चे इस मुक्तबाजार की चकाचौंध में आत्मध्वंस की तरफ बढ़ रहे हैं।
कल का दिन दुर्घटनाओं के नाम रहा।
कल सोदपुर में दो टीनएजरों की मोटरबाइक दुर्घटना में मौत की वजह सै जनजीवन स्तब्ध सा हो गया।
समाजसेवी रामू के इकलौते बेटे और उसके दोस्त की मौत से दिनभर अफरातफरी रही।
इसीलिए कल अक्षर प्र्व में 2006 में प्रकाशित अपनी कविता ईअभिमन्यु उन खोते हुे बच्चों की याद में पोस्ट करके खुद को सांत्वना सी दी।
इलाके का भूगोल बदल गया है।
कल उस शवयात्रा में सौ से ज्यादा उन बच्चों के दोस्त स्कार्पियो गाड़ियों के साथ श्मसान पर मौजूद थे।
संघर्षशील गरीब परिवारों के बच्चे नवधनाढ्य परिवारों की जीवन शैली में जैसे तेजी से अभ्यस्त हो रहै हैं।
कहना मुश्किल है कि अब शोक का समय किसके लिए भारी पड़ने वाला है।
इलाके का भूगोल सिरे से बदल गया है।
पुश्तैनी मकानों की जगह बहुमंजिली इमारतें खड़ी हो गयी है।
गली मोहल्ले में अजनबी चेहरों का हुजूम है।
अपने ही बच्चों से संवाद की स्थिति खत्म सी है।
बल्कि माहौल पीढ़ियों के दरम्यान अभूतपूर्व  शत्रुता का बन गया है।
स्मृतियां तेजी से खत्म हो रही है।
सपनों का कत्लेआम है।
हममें से हर कोई इस घनघोर संकट में अकेला ,निहत्था और असहाय है।
सारी क्रयशक्ति और डिजिटल कैसलैस इंडिया के सारे कालेधन से हम अपनी नई पीढ़ी को बचा  नहीं पा रहे हैं।
 और किसी को इसका अहसास नहीं है कि मां बाप की हमारी पीढ़ी कितनी बुरीतरह फेल है। 
बेहद भयानक समय है यह और दिलोदिमाग लहूलुहान है।
शंकर गुहा नियोगी के छत्तीसगढ़ संघर्ष और नवनिर्माण आंदोलन में नियोगी के साथी और बंगाल में शहीद अस्पताल की तर्ज पर श्रमजीवी अस्पताल चलाने वाले डा.पुण्यव्रत गुण की किताब का अनुवाद करने में लगा हूं।
रियल टाइम अपडेट में इसलिए निरंतरता है नहीं।
नोटबंदी में बेहिसाब नकदी सिर्फ पांच सौ करोड़ की निकली है तो यूपी में अबूझ पहेली है।
मौका लगा तो शाम तक जानारियां शेयर करने की कोशिश करुंगा।
जो भी प्रासंगिक लिंक मिलेगा,वह इस बीच शेयर करते जाउंगा।
हम तमाम जरुररी लिंक और प्रासंगिक कांटेट शेयर करें तो भी जानकारी मिलेगी जनता को,कृपया इस पर गौर करें।
बाकी नाकाबंदी और सेंसरशिप दोनों है।आपातकाल जारी है।
जीने के लिए दिहाड़ी बेहद जरुरी है।
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प्रतिरोध की कहानियां


डा.अरविंद कुमार को धन्यवाद क्योंकि उन्होंने महतोष मोड़ आंदोलन पर लिखी और 1991 मेरी कहानी सागोरी मंडल अभी मंडल अभी जिंदा है,को अपने संकलन प्रतिरोध की कहानियां में हिंदी के तमाम दिग्गज और मेररे अत्यंत प्रिय कथाकारो की कहानियों के साथ शामिल किया है।मैंने करीब सोलह सत्रह साल से कोई कहानी नहीं लिखी है,हांलांकि शलभ श्रीराम सिंह की पहल पर मेरा दूसरा कहानी संग्रह ईश्वर की गलती  2001 में छपा है।मैंने अनछपी कहानियां या कविताएं किसी को इन सोलह सत्रह सालों में कहीं छपने के लिए भेजी नहीं है।
मरे लिे यह सुखद अचरज है कि कमसकम कुछ लोग कहानी कविता के सिसिले में मुझे अब भी याद करते हैंं।
अरविंद कुमार जी से पिछले दिनों लंबा गपशप हुआ था और तब भी उन्होंने मेरी कहानी का जिक्र नहीं किया था,अलबत्ता चुनिंदा कहानियों का संग्रह भेजने के लिए मेरा पता लिखवा लिया था।
सागोरी मंडल बांग्ला में अनूदित है।यह कहानी किन किन पत्रिकाओं में छपी है,मुझे अभी याद नहीं है।आदरणीय गीता गैरोला जी ने बीच में इस कहानी के बारे में पूछा था,जिसकी कोई प्रति मेरे पास नहीं है।हालांकि वह मेरे अंडे सेंते लोग कहानी संग्रह में छपी है।इसके अलावा सामाजिक यथार्थ की कहानियां जैसे शीर्षके के किसी संकलन में भी यह कहानी संकलित हुी है।उसकी प्रति भी मेरे पास नहीं है।
गीता जी ने बताया कि उत्तरा में यह कहानी छपी थी।मुझे नहीं मालूम है।बहरहाल उत्तरा में बंगाल की मौसी ट्रेनों पर एक कथा अक्टोपस उत्तरा में छपी थी,उसकी याद है।
इस संकलन में शामिल कहानीकारों में हमारे पुरातन मित्र संजीव की बेहतरीन कहानी ापरेशन जोनाकी भी है।पंकज बिष्ट की कहानी हल,विद्यासागर नौटियाल जी की कहानी भैंस का कट्या,मधुकर सिंह की दुश्मन,शिवमूर्ति की कहानी सिरी उपमा जोग,देवेंद्र सिह की कहानी कंपनी बहादुर,जयनंदन की कहानी विश्वबाजार का ऊंट,विजेंद्र अनिल की कहानी फर्ज,विजयकांत की कहानी राह,अवधेश प्रीत की कहानी नृशंस भी शामिल हैं।
उम्मीद है कि हिंदी के पाठकों को हिंदी कहानी का भूला बिसरा जमाना याद आयेगा।अरविंद जी का आभार।
प्रकाशक अनामिका पब्लिशर्स को धन्यवाद।
331 पेज की इस किताब की कीमत आठ सौ रुपये रखी गयी है।यह मुझे ठीक नहीं लग रहा है।
बांग्ला  में इतने पेज की किताब की कीमत ढाई सौ रुपये केआसपास होती है।कोई रचनासमग्प्रर भी किफायती दाम पर पाठको के लिए उपलब्काध है।प्रकाशक से सीधे लेने पर किताबब की कीमत दो सौ रुपये के आस पास बैठती है।बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं की किताबों की सरकारी खरीद नहीं होती,इसलिए वे पाठकों का ख्याल रखते हैं।मराठी,उड़िया और असमिया में भी किताबें पाठकों तक पहुंचाने की गरज होती है।
हम नहीं जानते कि इतनी महंगी किताबें कौन पढ़ेंगे।बहरहाल हमारी को चुनने के लिए आभारी जरुर हूं।
हो सकता है कि हिंदी में किताब छपने की लागत ज्यादा बैठती हो।अरसे बाद कोई कहानी छपी भी तो आम पाठकों तक पहुंचने की उम्मीद कम है।मेरे लिए यह अहसास सुखद नहीं है।
पलाश विश्वास
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Sunday, January 15, 2017

Saradindu reports.half pant to Full pant with Ambedkar মঞ্চে অশোক, সাজাহান, নিবেদিতা, আম্বেদকরের ছবি বিশেষ প্রতিবেদন, শরদিন্দু উদ্দীপন :


Saradindu reports.half pant to Full pant with Ambedkar

মঞ্চে অশোক, সাজাহান, নিবেদিতা, আম্বেদকরের ছবি
বিশেষ প্রতিবেদন, শরদিন্দু উদ্দীপন : 
https://m.facebook.com/story.php…

হাপ প্যান্ট থেকে ফুল প্যান্টঃ 
কনুইয়ের কাছে ভাজ করা সাদা ফুলসার্ট, খাকী হাপপ্যান্ট, লম্বা কালোজুতো, চামড়ার বেল্ট, মাথায় খাকির টুপি আর হাতে লাঠি নিয়ে ১৯২৫ সালে শুরু হয়েছিল রাষ্ট্রীয় স্বয়ং সেবক সংঘের কুচকাওয়াজ। এদের ভাগুয়া নিশানে জায়গা পায় স্বস্তিক চিহ্ন। হিন্দু মহাসভা ভেঙ্গে ওই বছর তৈরি হয় এই সঙ্ঘ। শুরু থেকেই এদের দৃষ্টিভঙ্গিতে ছিল জঙ্গিপনা। আরএসএস এর প্রতিষ্ঠাতা কেশব বলিরাম হেজোয়ারের বিরুদ্ধে ছিল দেশদ্রোহিতার মামলা।
আরএসএস এর এই পোশাকে প্রথম পরিবর্তন আসে ১৯৩০ সালে। খাকী টুপির পরিবর্তে আসে হিটলারের অনুকরণে কালো টুপি। এদের কিংবদন্তী নেতা মাধব সদাশিব গোলোয়ারকার হিটলারের সঙ্গে দেখা করে জঙ্গিবাদে অনুপ্রাণিত হন এবং খোলাখুলি হিটলারের আর্য তত্ত্বকে সমর্থন করেন। গোলওয়ার্কর এবং আর এক কিংবদন্তী নেতা সাভারকর দুজনেই ছিলেন হিটলারের অন্ধ ভক্ত। সম্ভবত এই কারনেই হিটলারের কালো টুপি এবং স্বস্তিক চিহ্ন আরএসএস এর প্রতীক চিহ্ন হয়ে দাঁড়ায়।
১৯৭৩ সালে আবার পরিবর্তন আসে। ভারি চামড়ার জুতোর বদলে আসে হালকা এবং স্টাইলিশ জুতো। কিন্তু চামড়ার বেল্ট নিয়ে শুরু হয় প্রশ্ন। গোমাতার চামড়া যে! অহিংস আন্দোলনের পক্ষে পশুর চামড়া ঠিক মানান সই নয়। ফলে রাতারাতি পশুর চামড়ার বেল্টের বদলে আসে ক্যানভাসের মোটা বেল্ট।
এর পরে আবার পরিবর্তন। এই পরিবর্তন এল ২০১৬ সালের আগস্ট মাসে। পরিবর্তনটা বেশ বিপ্লবাত্মক। ৯১ বছর ধরে এই হাটুর উপরে হাপ প্যান্ট নব্যদের ঠিক মনপূত নয়। এতে নিজেকে কেমন একেবারে সেকেলে মনে হয়। নাগপুরের হেড অফিস নব্যদের কথা ভেবে বিষয়টিকে মেনে নিল।
গতকাল ১৪ই জানুয়ারী ২০১৭ এই নতুন ফুল প্যান্ট পরা আরএসএস ক্যাডারদের কুচকাওয়াজ দেখার সুজোগ পেল কোলকাতা। কিন্তু আরএসএস এর মঞ্চ শয্যায় এমন পরিবর্তনের আশা ঘুণাক্ষরেও করেননি কোলকাতাবাসি! তাদের মূল মঞ্চের ব্যানারে সম্রাট অশোক, সাজাহান, সিস্টার নিবেদিতা এবং বাবা সাহেব আম্বেদকর! হ্যা, আপনি যদি আরএসেসকে চেনেন তবে এই ছবি দেখে অন্তত বার দশেক চোখ কচলাতে হবে! ঠিক দেখছেন তো? মঞ্চের সামনে কেশব বলিরাম হেজোয়ার আর গোলোয়ারকার তো ঠিক আছে। নাথুরাম থাকলেও আপত্তি ছিল না, কিন্তু আম্বেদকর!!
হ্যা, এটাই আরএসএস এর পরিবর্তন। খাঁদির চরকাতে গান্ধীর পরিবর্তে নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি আর ওং ভারতমাতা এবং ভাগুয়া ধ্বজের সাথে অশোক, সাজাহান ও আম্বেদকর।
বন্ধুরা এই পরিবর্তন কি কাকতালীয়। আমরা জানি এটা হঠাৎ তাল পড়ার মত কোন বিষয় নয়। "গর্ব করে বল আমি হিন্দু" এই ছিল যাদের শ্লোগান তাদের এই রাতারাতি পরিবর্তন আসলে একটি রণকৌশল। এটা হিন্দুত্ববাদ এবং মনুবাদেরই পুনর্জাগরণ। আর সেই সাথে বাবা সাহেব আম্বেদকরকে হাইজ্যাক করে ভাগুয়া শিবিরের আইকন বানানোর ষড়যন্ত্র।
বিজেপির আড়াই বছরের শাসন কালকে মূল্যায়ন করলেই বুঝতে পারবেন এই পরিবর্তনটি আসলে একটি ধাঁধাঁ।
২০১৬ সালের ১৭ই জানুয়ারী রোহিত ভেমুলার প্রাতিষ্ঠানিক হত্যাকাণ্ডের পরে ঘোরতর বিপদে পড়ে গেছে ব্রাহ্মন্যবাদ। প্রমান হয়েছে তারা ভারত বিধ্বংসী বিষ। মুজাপফরনগর, দাদরি, উনা, কালাহান্ডি সর্বত্র চলছে ব্রাহ্মন্যবাদের বিরুদ্ধে প্রবল প্রতিরোধ। গো-রক্ষকদের নৃশংস ডাণ্ডাকেও ক্লান্ত করে ছেড়েছে দলিত-বহুজনের সার্বিক উত্থান। উনার ঘটনায় প্রতিবাদের ঝড় উঠেছে সর্বত্র। চর্মকার ভাইদের সমর্থনে এগিয়ে এসেছে দলিত মুসলিম ভাইয়েরা। তাদের সম্মিলিত বিপুল প্রতিরোধের কাছে নতিস্বীকার করে গদি ছাড়তে হয়েছে গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রীকে। ভারতের প্রতি কোনে কোনে সংঘটিত হয়েছে দীপ্ত মিছিল। দেশের জনগণের মধ্যে সংহতির চেতনা জাগ্রত কারার জন্য জাতপাতের ভেদভাবকে উপেক্ষা করে মিছিলে মিলিত হয়েছে অগণিত মানুষ। তারা দীপ্ত ভাবে ঘোষণা করেছে ব্রাহ্মন্যবাদ নিপাত যাক, জাতপাত নিপাত যাক, মনুর শাসন ধ্বংস হোক। তারা হুঁশিয়ার করেছে সেই সব দাঙ্গাবাজদের যারা নিজের হাতে আইন তুলে নিয়ে ভারতীয় শাসনব্যবস্থাকে ভেঙ্গে ফেলার চক্রান্তে সামিল হয়েছে। তারা দাবী করেছে যে সব কাজের জন্য জাতপাত নির্ণয় করা হয় সেই কাজ আর তারা করবেনা। তারা দাবী করেছে সরকারকে তাদের প্রাপ্য জমি ফেরত দিতে হবে এবং সেই জমিতে খাদ্য উৎপাদন করে তারা মর্যাদার সাথে জীবনযাপন করবে।
দলিত-বহুজন মানুষেরা বুঝতে পেরেছেন যে বাবা সাহেবের Social inclusive doctrine বা ভাগিদারী দর্শনই ৮৫% মূলনিবাসী বহুজন সমাজকে কেন্দ্রীভূত করে তুলবে এবং এই ভাগিদারী সামাজিক শৈলী বহুজনদের রাষ্ট্র ক্ষমতার কেন্দ্র বিন্দুতে নিয়ে আসবে। স্বাধিকার এবং ভাগিদারীর সুষম বন্টন নিশ্চিত হলে শ্রেণি-সংগ্রামহীন, হিংসাশ্রয়ী রক্তরঞ্জিত যুদ্ধ ছাড়াই সংঘটিত হবে এক নিঃশব্দ রাষ্ট্র বিপ্লব। সর্বজনের কল্যাণে সর্বজনের রাষ্ট্রীয় উত্থান। এই রাষ্ট্রীয় উত্থানে হাপ প্যান্টের দর্শন সেকেলে হয়ে যাবে। তাই দলিত বহুজনের চোখের সামনে বাবা সাহেবের ছবির প্রলেপ লাগিয়ে ভাগুয়া ধ্বজ ওড়াতে চাইছে আরএসএস।

Image may contain: sky and outdoor

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Saturday, January 14, 2017

तस्वीर को लेकर हंगामा बरपा है कत्लेआम से बेपरवाह सियासत है असल मकसद संविधान के बदले मनुस्मृति विधान लागू करने का है! संभव है कि भीम ऐप के बाद शायद नोट पर गांधी को हटाकर मोदी के बजाय बाबासाहेब की तस्वीर लगा दी जाये! पलाश विश्वास

तस्वीर को लेकर हंगामा बरपा है

कत्लेआम से बेपरवाह सियासत है

असल मकसद संविधान के बदले मनुस्मृति विधान लागू करने का है!

संभव है कि भीम ऐप के बाद शायद नोट पर गांधी को हटाकर मोदी के बजाय बाबासाहेब की तस्वीर लगा दी जाये!

पलाश विश्वास

याद करें कि नोटबंदी की शुरुआत में ही हमने लिखा था कि नोटबंदी का मकसद नोट से गांधी और अशोक चक्र हटाना है।

हमारे हिसाब से आता जाता कुछ नहीं है।गांधी की तस्वीर को लेकर जो तीखी प्रतिक्रिया आ रही हैं,जनविरोधी नीतियों के बारे में कोई प्रतिक्रिया सिरे से गायब है।

तस्वीर को लेकर हंगामा बरपा है

कत्लेआम से बेपरवाह सियासत है

बैंक से कैश निकालने पर टैक्स लगाने की योजना नोटबंदी का अगला कैसलैस डिजिटल चरण है जबकि ट्रंप सुनामी से तकनीक का हवा हवाई किला ध्वस्त होने को है।इसके साथ ही तमाम कार्ड खारिज करके आधार पहचान के जरिये लेनदेन लागू करने का तुगलकी फरमान है,जिसपर राजनीति आधार योजना सन्नाटा दोहरा रही है।

सीएनबीसी-आवाज़ को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक आधार बेस्ड पेमेंट सिस्टम को लागू करने में आ रही बड़ी अड़चन दूर हो गई है। आधार बेस्ड फिंगर प्रिंट स्कैनर के जरिये पेमेंट लेने वाले व्यापारियों को 0.25-1 फीसदी तक का कमीशन मिलेगा। यूआईडीएआई के मुताबिक आधार बेस्ड ट्रांजैक्शन अपनाने के लिए दुकानदारों को कोई चार्ज नहीं देना पड़ेगा, ना ही उन्हें पीओएस मशीन का खर्च लगेगा।सूत्रों के मुताबिक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, आईडीएफसी बैंक और इंडसइंड बैंक ने आधार पर आधारित पेमेंट सिस्टम तैयार कर लिया है जबकि आईसीआईसीआई बैंक और पीएनबी समेत 11 और बैंक भी इसकी तैयारी में लगे हैं। आधार सिस्टम के जरिये पेमेंट करने के लिए सिर्फ आधार नंबर और बैंक चुनने की जरूरत होगी।

सरकारी पेमेंट एप्लिकेशन भीम को मिल रहे बढ़िया रिस्पांस से उत्साहित सरकार आधार पे सिस्टम को जल्द से जल्द लागू करना चाहती है। सीएनबीसी-आवाज़ को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक आधार पे सिस्टम को अलग से नहीं बल्कि भीम के प्लेटफॉर्म पर ही इस महीने के आखिर तक लॉन्च किया जाएगा।

जब डिजिटल कैशलैस के लिए भीमऐप है तो गांधी को हटाकर अंबेडकर की तस्वीर लगाकर संघ परिवार को बहुजनों का सफाया करने से कौन रोकेगा?

बहुजनों को केसरिया फौज बनाने के लिए जैसे कैशलैस डिजिटल इंडिया में भीमऐप लांच किया गया है,वैसे ही बहुत संभव है कि जब गांधी के नाम वोट बैंक या चुनावी समीकरण में कुछ भी बनता बिगड़ता नहीं है तो भीम ऐप के बाद शायद नोट पर गांधी को हटाकर मोदी के बजाय बाबासाहेब की तस्वीर लगा दी जाये।

बाबासाहेब के मंदिर भी बन रहे हैं।बाबासाहेब गांधी के बदले नोट पर छप भी जाये तो गांधी और अशोकचक्र से छेड़छाड़ का मतलब भारतीय संविधान के बदले मनुस्मृति विधान लागू करने का आरएसएस का एजंडा ग्लोबल कारपोरट हिंदुत्व का है।राजनीतिक विरासत की इस लड़ाई पर नजर डालें तो नेहरू, इंदिरा की विरासत को दरकिनार करने की कोशिश नजर आती है। मोदी सरकार ने अपनी इस निति के तहत आंबेडकर पर जोरशोर से कार्यक्रम किए। वल्लभ भाई पटेल की याद में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की योजना है। बीजेपी का जेपी की जयंती बड़े पैमाने पर मनाने फैसला है। नेहरू संग्रहालय की काया-पलट करने की योजना है।

बंगाल में भी बहुजनों का केसरिया हिस्सा इस उम्मीद में है कि यूपी जीतने के बाद नोटों से गांधी हट जायेंगे और वहां बाबासाहेब विराजमान होंगे।बहुजनों को गांधी से वैसे ही एलर्जी है जैसे वामपक्ष को अंबेडकर से अलर्जी रही है।

बंगाल में बहुजनों के दिमाग को दही बनाने के लिए मोहन भागवत पधारे हैं।

गांधी के बदले नोट पर अंबेडकर छापने की बात को अबतक हम मजाक समझ रहे थे।यूपी में यह ख्वाब चालू है या नहीं,हम नहीं जानते।मगर हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा नेता अनिल विज के बयान से साफ जाहिर है कि नोट से गांधी की तस्वीर हटने ही वाली है,चाहे नई तस्वीर मोदी की हो या अंबेडकर की।

अंबेडकर की तस्वीर लगती है तो बहुजन वोटबैंक का बड़ा हिस्सा एक झटके से केसरिया हो जाने वाला है।संघ सरकार के मंत्री यूं ही कोई शगूफा छोड़ते नहीं है।

हर शगूफा का एक मकसद होता है।मोदी की तस्वीर लगे या न लगे,साफ है कि करेंसी से गांधी हटेंगे और उसके बाद अशोकचक्र भी खारिज होगा।फिर हिंदू राष्ट्र के लिए सबसे बड़े सरदर्द भारत के संविधान का हिसाब किताब बराबर किया जाना है।जिसके लिए संघ परिवार ने नोटबंदी का गेमचेंजर चलाया हुआ  है और तुरुप का पत्ता समाजवादी सत्ता विमर्श है।

महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने एकदम सही कहा है कि भ्रष्ट नेता गलत कामों में जिस तरह से रुपयों का इस्तेमाल करते हैं उससे तो अच्छा ही है कि अगर नोटों से बापू की तस्वीर हटा दी जाए।उनकी यह टिप्पणी हरियाणा के उन्हीं स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा नेता अनिल विज उस विवादित बयान पर आई है, जिसमें उन्होंने आज कहा है कि जब से महात्मा गांधी की फोटो नोट पर लगी है, तब से नोट की कीमत गिरनी शुरू हो गई।

गौरतलब है कि विज ने अपने बयान में कहा कि महात्मा गांधी का नाम खादी से जुड़ने के कारण इसकी दुर्गति हुई। खादी के बाद अब धीरे-धीरे नोटों से भी गांधी जी की तस्वीर हट जाएगी।उन्होंने मोदी को गांधी से बड़ा ब्रांड बताते हुए खादी से हटाने के बाद नोट से बी गांधी को हटाकर मोदी की तस्वीर लगाने की बात भी कह दी है। विज ने कहा है कि खादी के बाद अब धीरे-धीरे नोटों पर से भी गांधी जी की तस्वीर हटाई जाएगी। उन्होंने कहा कि गांधी जी के चलते रूपये की कीमत गिर रही है। साथ ही विज ने कहा कि गांधी के नाम से खादी पेटेंट नहीं है बल्कि खादी के साथ गांधी का नाम जुड़ने से खादी डूब गई है। वहीं उन्होंने कहा है कि खादी के लिए पीएम मोदी ज्यादा बड़े ब्रैंड एंबेसडर हैं।हालांकि उनके बयान से भाजपा ने किनारा कर लिया है और उसे उनका व्यक्तिगत बयान करार दिया। विवाद बढ़ता देख विज ने अपना बयान वापस ले लिया।

मीडिया केमुताबिक खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर में महात्मा गांधी की जगह पीएम मोदी की तस्वीर लगाने पर केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने सफाई दी है। कलराज मिश्र ने कहा है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि केलेंडर में पीएम का फोटो कैसे लगी। गांधी की बराबरी कोई नहीं कर सकता। इधर बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा है कि मोदी की तस्वीर को लेकर बेकार का विवाद पैदा किया जा रहा है। बीजेपी की सफाई है कि कैलेंडर पर गांधी की तस्वीर 7 बार पहले भी नहीं छपी है। पीएम मोदी ने खादी को बढ़ावा दिया है। पीएम ने खादी फॉर नेशन, खादी फॉर फैशन का नारा दिया। यूपीए के दौर में खादी की बिक्री में औसतन 5 फीसदी बढ़ी जबकि मोदी सरकार आने के बाद बिक्री 35 फीसदी बढ़ी है। मोदी सरकार गांधी दर्शन को घर-घर पहुंचा रही है।

इससे पहले तुषार गांधी ने खादी ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के डायरी-कैलेंडर विवाद के बीच शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने ट्वीट कर कहा, "प्रधानमंत्री पॉलीवस्त्रों के प्रतीक हैं जबकि बापू ने अपने बकिंघम पैलेस के दौरे के दौरान खादी पहनी थी न कि 10 लाख रुपये का सूट।"

उन्होंने केवीआईसी को बंद करने की मांग करते हुए कहा, "हाथ में चरखा, दिल में नाथूराम। टीवी पर ईंट का जवाब पत्थर से देने में कोई बुराई नहीं है।"

तुषार गांधी अपने ट्वीट में बापू की 1931 की ब्रिटेन यात्रा का हवाला दे रहे थे जब उन्होंने ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी से मुलाकात की थी उन्होंने खादी की धोती और शॉल पहन रखा था।मोदी ने इसकी तुलना में भारत में राष्ट्रपति बराक ओबामा की यात्रा के दौरान विवादास्पद 10 लाख रुपये का सूट पहना था।

तुषार ने इससे पहले ट्वीट कर कहा था, "तेरा चरखा ले गया चोर, सुन ले ये पैगाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम। पहले, 200 रुपये के नोट पर बापू की तस्वीर गायब हो गई, अब वह केवीआईसी की डायरी और कैलेंडर से नदारद हैं। उनकी जगह 10 लाख रुपये का सूट पहनने वाले प्यारे प्रधानमंत्री की तस्वीर लगी है।"

गौरतलब है कि केवीआईसी के 2017 के डायरी और कैलेंडर पर गांधी की जगह मोदी की तस्वीर छापे जाने पर सरकार और केवीआईसी को तमाम राजनीतिक दलों की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

हम नोटबंदी के बाद भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी के खतरों से आपको लगातार आगाह करते रहे हैं।संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) ने भी बेरोजगारी बढ़ने का अंदेशा जता दिया है।अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली को हिंदुत्व के ग्लोबल एजंडे और मनुस्मृति संविधान के लिए जिस तरह दांव पर लगाया गया है,रोजगार खोकर भारत की जनता को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

2017-2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में मामूली इजाफा हो सकता है और रोजगार सृजन में बाधा आने के संकेत हैं। संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) ने 2017 में वैश्विक रोजगार एवं सामाजिक दृष्टिकोण पर गुरुवार को अपनी रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट के अनुसार रोजगार जरूरतों के कारण आर्थिक विकास पिछड़ता प्रतीत हो रहा है और इसमें पूरे 2017 के दौरान बेरोजगारी बढऩे तथा सामाजिक असमानता की स्थिति के और बिगड़ने की आशंका जताई गई है। वर्ष 2017 और 2018 में भारत में रोजगार सृजन की गतिविधियों के गति पकडऩे की संभावना नहीं है क्योंकि इस दौरान धीरे-धीरे बेरोजगारी बढ़ेगी और प्रतिशत के संदर्भ में इसमें गतिहीनता दिखाई देगी।

भारतीय पेशेवरों को लगेगा झटका

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की इमिग्रेशन पॉलिसी में बदलाव के संकेत का असर उनका टर्म शुरू होने के पहले दिन से ही दिखने वाला है। इससे सबसे ज्यादा झटका अमरीका में जॉब्स की मंशा रखने वाले भारतीयों को लगेगा। ट्रम्प 20 जनवरी को अमरीका के राष्ट्रपति का पद संभालेंगे। ट्रम्प ने एच1बी वीजा के नियमों को कड़ा करने की पैरवी करने वाले जेफसेसंस को अटॉर्नी जनरल की पोस्ट के लिए चुना है। ट्रम्प के शपथ ग्रहण करने से पहले 2 अमरीकी सांसदों ने एक बिल पेश किया है जिसमें वीजा प्रोग्राम में बदलाव की मांग की है। इस बिल में कुछ ऐसे प्रस्ताव हैं जिनका सीधा असर इंडियन वर्कर्स पर हो सकता है। अमरीकी सांसदों द्वारा पेश किए गए बिल 'प्रोटैक्ट एंड ग्रो अमरीकन जॉब्स एक्ट' में एच1बी वीजा के लिए एलिजिबिलिटी में कुछ बदलाव का प्रस्ताव है।

बिल में क्या बदलाव होने हैं

ह्यबिल में एच1बी एप्लीकेशन के लिए मास्टर डिग्री में छूट को हटाने की मांग की गई है। इससे मास्टर या इसी जैसी दूसरी डिग्री होने पर एडीशनल पेपरवर्क से राहत मिलेगी। अमरीका जाने वाले ज्यादातर आई.टी. प्रोफैशनल्स के पास मास्टर डिग्री होती है। ह्य50 इम्प्लाइज से ज्यादा वाली कम्पनियों में अगर 50 प्रतिशत एच1बी या एल1 वीजा वाले हैं तो ऐसी कम्पनियों को ज्यादा हायरिंग से रोका जाए। एच1बी वीजा की मिनिमम सैलरी एक लाख डॉलर सालाना होनी चाहिए। अभी यह 60,000 डॉलर सालाना है। एच1बी वीजा वर्कर के लिए मिनिमम सैलरी 1 लाख डॉलर सालाना करने से अमरीका में कम्पनियां भारतीय आई.टी. प्रोफैशनल्स की हायरिंग कम करेंगी। इनकी जगह वे अमरीकी वर्कर्स को ही तरजीह देंगी।भारतीयों पर पड़ेगा असरह्य85,000 से ज्यादा एच1बी वीजा सालाना जारी करता है अमरीका70 से 75 हजार ऐसे वीजा भारतीय आई.टी. पेशेवरों को मिलते हैंह्य1 लाख डॉलर के सालाना वेतन की अनिवार्यता की विदेशी कर्मियों के लिए।

2017 में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ रहेगी

रिपोर्ट के अनुसार आशंका है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। प्रतिशत के संदर्भ में 2017-18 में बेरोजगारी दर 3.4 प्रतिशत बनी रहेगी। वर्ष 2016 में रोजगार सृजन के संदर्भ में भारत का प्रदर्शन थोड़ा अच्छा था।  रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि 2016 में भारत की 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर ने पिछले साल दक्षिण एशिया के लिए 6.8 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करने में मदद की है। रिपोर्ट के अनुसार विनिर्माण विकास ने भारत के हालिया आर्थिक प्रदर्शन को आधार मुहैया कराया है।

वैश्विक श्रम बल में लगातार बढ़ौत्तरी

वैश्विक बेरोजगारी दर और स्तर अल्पकालिक तौर पर उच्च बने रह सकते हैं क्योंकि वैश्विक श्रम बल में लगातार बढ़ौतरी हो रही है। विशेषकर वैश्विक बेरोजगारी दर में 2016 के 5.7 प्रतिशत की तुलना में 2017 में 5.8 प्रतिशत की मामूली बढ़त की संभावना है। आई.एल.ओ. के महानिदेशक गाइ राइडर ने कहा कि इस वक्त हम वैश्विक  अर्थव्यवस्था के कारण उत्पन्न क्षति एवं सामाजिक संकट में सुधार लाने और हर साल श्रम बाजार में आने वाले लाखों नव आगंतुकों के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के निर्माण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। आई.एल.ओ. के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और रिपोर्ट के मुख्य लेखक स्टीवेन टॉबिन ने कहा कि उभरते देशों में हर 2 श्रमिकों में से एक जबकि विकासशील देशों में हर 5 में से 4 श्रमिकों को रोजगार की बेहतर स्थितियों की आवश्यकता है। इसके अलावा विकसित देशों में बेरोजगारी में भी गिरावट आने की संभावना है और यह दर 2016 के 6.3 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत तक हो जाने की संभावना है।


Friday, January 13, 2017

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख आ गए अच्छे दिन, खादी उद्योग के कैलेंडर व डायरी से गांधीजी गायब, मोदी विराजमान


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Thursday, January 12, 2017

कत्ल हुए ख्वाबों का खून आपके हाथों में हैं,ओबामा! दुनिया नहीं बदली,न जाति, धर्म, नस्ल,रंग के नाम नरसंहार थमा है। भारत में जाति,अस्पृश्यता और रंगभेद का त्रिशुल हिंदुत्व का सबसे घातक हथियार है,जो अब फासिज्म का राजकाज है।मुक्त बाजार भी वही है। दुनिया यह देख रही है कि भारत ‘हिंदू राष्ट्रवादी उन्माद’ से कैसे निपटता है! ओबामा साहेब,मोदी से दोस्ती और हिलेरी के साथ दुनिया बदलने का ख्वाब बे�

कत्ल हुए ख्वाबों का खून आपके हाथों में हैं,ओबामा!

दुनिया नहीं बदली,न जाति, धर्म, नस्ल,रंग के नाम नरसंहार थमा है।

भारत में जाति,अस्पृश्यता और रंगभेद का त्रिशुल हिंदुत्व का सबसे घातक हथियार है,जो अब फासिज्म का राजकाज है।मुक्त बाजार भी वही है।

दुनिया यह देख रही है कि भारत 'हिंदू राष्ट्रवादी उन्माद' से कैसे निपटता है!

ओबामा साहेब,मोदी से दोस्ती और हिलेरी के साथ दुनिया बदलने का ख्वाब बेमायने हैं।इस धतकरम की वजह से जाते जाते अमेरिका और दुनिया को डोनाल्ड ट्रंप जैसे धुर दक्षिणपंंथी कुक्लाक्सक्लान के नरसंहारी रंगभेदी संस्कृति के हवाले कर गये आप।दुनिया में वर्ण,जाति रंगभेद का माहौल बदला नहीं,आप कह गये।भारत में हिंदुत्व एजंडा और भारत में मनुस्मृति शान बहाल रखने के तंत्र मंत्र यंत्र को मजबूत बनाते हुए आप कैसे डोनाल्ड ट्रंप को रोक सकते थे,सवाल यह है।सवाल यह भी है कि भारत में असहिष्णुता के फासिस्ट राजकाज के साथ नत्थी होकर अमेरिका में फासिज्म को आप कैसे रोक सकते थे?

पलाश विश्वास

कत्ल हुए ख्वाबों का खून आपके हाथों में हैं,ओबामा!

दुनिया नहीं बदली,न जाति,धर्म,नस्ल ,रंग के नाम नरसंहार थमा है।

विदाई भाषण में सबसे गौरतलब रंगभेद पर बाराक ओबामा का बयान है।रंगभेद पर अपने विचार रखते हुए ओबामा ने कहा कि अब स्थिति में काफी सुधार है जैसे कई सालों पहले हालात थे अब वैसे नहीं हैं। हालांकि रंगभेद अभी भी समाज का एक विघटनकारी तत्व है। इसे खत्म करने के लिए लोगों के हृदय परिवर्तन की जरूरत है, सिर्फ कानून से काम नहीं चलेगा।

भारत आजाद होने के बाद,बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का संविधान लागू हो जाने के बाद,दलितों की सत्ता में ऊपर से नीचे तक भागेदारी के बाद हमारे लोग भी दावा करते हैं कि जाति टूट रही है या फिर जाति नहीं है। हद से हद इतना मानेंगे कि जाति तो है,लेकिन साहेब न अस्पृश्यता है और न रंगभेद कहीं है।

सच यह है कि भारत में जाति,अस्पृश्यता और रंगभेद का त्रिशुल हिंदुत्व का सबसे घातक हथियार है,जो अब फासिज्म का राजकाज है।मुक्त बाजार भी वही है।

दुनियाभर के अश्वेतों को उम्मीद थी कि बाराक ओबामा की तख्तपोशी से अश्वेतों की दुनिया बदल जायेगी।मार्टिन लूथर किंग का सपना सच होगा।ओबामा की विदाई के बाद अब साफ हो गया है कि दुनिया बदली नहीं है।दुनिया का सच रंगभेद है।

तैंतालीस अमेरिकी श्वेत राष्ट्रपतियों से बाराक ओबामा कितने अलग हैं,अभी पता नहीं चला है।जाते जाते वे लेकिन कह गये कि सभी आर्थिक संकट को अगर मेहनतकश श्वेत अमेरिकी जनता और अयोग्य अश्वेतों को बीच टकराव मान लिया जाये,तो असल समस्या का समाधान कभी नहीं हो सकता।यही रंगभेद है।

ओबामा ने यह भी कहा कि कुछ लोग जब अपने को दूसरों के मुकाबले ज्यादा अमेरिकी समझते हैं तो समस्या वहां से शुरु होती है।ओबामा ने मान लिया की अमेरिका में रंगभेद अब भी है।रंगभेद अब भी है।हमारी आजादी का सच भी यही है।

यह सच जितना अमेरिका का है,उतना ही बाकी दुनिया का सबसे बड़ा सच है यह।यह भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास भूगोल का सच है जो विज्ञान के विरुद्ध है।

मुक्त बाजार में तकनीक सबसे खास है।तकनीक लेकिन ज्ञान नहीं है।हमने तकनीक सीख ली है और सीख भी रहे हैं।

कहने को जयभीम है।

कहने को नमोबुद्धाय है।

हमारी जिंदगी में न कहीं भीम है और न कहीं बुद्ध है।

हमारी जिंदगी अब भीम ऐप है,जिसमें भीम कहीं नहीं है।हमारी जिंदगी मुक्त बाजार है,जिसमें मुक्ति कहीं नहीं है गुलामी के सिवाय।गुलामगिरि इकलौता सच है।

दिलोदिमाग में गहराई तक बिंधा है जाति,अस्पृश्यता और रंगभेद का त्रिशुल।जो हमारा धर्म है,हमारा कर्म है।कर्मफल है।नियति है।सशरीर स्वर्गवास है।राजनीति वही।

गुलामी का टैग लगाये हम आदमजाद नंगे सरेबाजार आजाद घूम रहे हैं। वातानुकूलित दड़बों में फिर हम वही आदमजाद नंगे हैं।लोकतंत्र के मुक्तबाजारी कार्निवाल में भी हमारा मुखौटा हमारी पहचान है,टैग किया नंबर असल है और बाकी फिर हम सारे लोग नंगे हैं और हमें नंगे होने का अहसास भी नहीं है।शर्म काहे की।

इसलिए घर परिवार समाज में कहीं भी संवाद का ,विमर्श का कोई माहौल है नहीं।चौपाल खत्म है खेत खलिहान कब्रिस्तान है।देहात जनपद सन्नाटा है।नगर उपनग महानगर पागल दौड़ है अंधी।हमारे देश में हर कोई खुद को ज्यादा हिंदुस्तानी मानने लगा है इन दिनों और इसमें हर्ज शायद कोई न हो,लेकिन दिक्कत यह है कि हर कोई दूसरे को विदेशी मानने लगा है इन दिनों।

हर दूसरा नागरिक संदिग्ध है।हर आदिवासी माओवादी है।हर तीसरा नागरिक राष्ट्रद्रोही है।देशभक्ति केसरिया सुनामी है।बाकी लोग कतार में मरने को अभिशप्त हैं।याफिर मुठभेड़ में मारे जाने वाले हैं।जो खामोश हैं जरुरत से जियादा,वे भी मारे जायेंगे।चीखने तक की आदत जिन्हें नहीं है।असहिष्णुता का विचित्र लोकतंत्र है।

अस्पृश्यता अब भी जारी है।अब भी भारत में भ्रूण हत्या दहेज हत्या घरेलू हिंसा आम है।स्वच्छता अभियान में थोक शौचालयों का स्वच्छ भारत का विज्ञापन पग पग पर है और लोग सीवर में जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं।सर पर फैखाना ढो रहे हैं।

अमेरिका में रंगभेद सर चढ़कर बोल रहा है इन दिनों और मारे यहां जाति व्यवस्था  के तहत हर किसी के पांवों के नीचे दबी इंसानियत अस्पृश्य है।रंगभेद से ज्यादा खतरनाक है यह जाति,जिसे मनुस्मृति शासन बहाल करके और मजबूत बनाने की राजनीति में हम सभी कमोबेश शामिल हैं।

विज्ञान और तकनीक जाहिर है कि हमें समता न्याय सहिष्णुता का पाठ समझाने में नाकाफी है उसीतरह ,जैसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र में रंगभेद की संस्कृति उसकी आधुनिकता है और हमारे यहां सारा का सारा उत्तर आधुनिक विमर्श और उसका जादुई यथार्थ ज्ञान विज्ञान ,तकनीक वंचितों, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के विरुद्ध है।असहिष्णुता,असमता,अन्याय और अत्याचार हमारे लोकतंत्र के विविध आयाम है और बहुलता के खिलाफ अविराम युद्ध है विधर्मियों के खिलाफ खुल्ला युद्ध,सैन्यतंत्र जो अमेरिका का भी सच है।इसलिए बाराक ओबामा की विदाई का तात्पर्य भारतीय संदर्भ में समझना अनिवार्य है।

यूपी में दंगल के मध्य नोटबंदी के नरसंहार कार्यक्रम को अंजाम देने के बाद जब अमेरिकी मीडिया भी इसे भारतीय जनता के खिलाफ सत्यानाश का कार्यक्रम बता रहा है,जब विकास दर घट रहा है तेजी से और भारत भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी के रूबरू लगातार हिंदुत्व के शिकंजे में फंसता जा रहा है,तब अमेरिकी अश्वेत राष्ट्रपति की विदाई के वक्तभारत के बारे में अमेरिकी नजरिया क्या है,गौरतलब है।एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि अगले पांच साल में भारत की ग्रोथ सबसे तेज रहेगी, लेकिन दुनिया यह भी देख रही है कि वह 'हिंदू राष्ट्रवादी उन्माद' से कैसे निपटता है, जिसके चलते अल्पसंख्यकों के साथ तनाव बढ़ रहा है।

हमारे समय के प्रतिनिधि कवि मंगलेश डबराल ने इस संकट पर बेहद प्रासंगिक टिप्पणी की हैः

आप कहाँ से आ रहे हैं?--फेसबुक से.

आप कहाँ रहते हैं?--फेसबुक पर.

आप का जन्म कहाँ हुआ?--फेसबुक पर.

आप कहाँ जायेंगे?--फेसबुक पर.

आप कहाँ के नागरिक हैं?--फेसबुक के.

गौरतलब है कि विश्व के महान धर्मों के मानने वालों में यहूदी, पारसी और हिन्दू अन्य धर्मावलंबियों को अपनी ओर आकृष्ट करके उनका धर्म बदलने में कोई रुचि नहीं रखते। लेकिन दुनिया में संभवतः हिन्दू धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो अपने मानने वालों के एक बहुत बड़े समुदाय को अपने से दूर ठेलने की हरचंद कोशिश करता है और उन्हें अपने मंदिरों में न प्रवेश करने की इजाजत देता है, न देवताओं की पूजा करने की।

अबाध पूंजी की तरह मुक्त बाजार की गुलामी का यह सबसे बड़ा सच है कि अस्पृश्यता का राजकाज है और रंगभेद बेलगाम है।रंगभेदी फासिज्म संस्कृति है।

मुक्तबाजार में संवाद नहीं है।हर कोई नरसिस महान है।आत्ममुग्ध।अपना फोटो,अपना अलबम,अपना परिवार,अपना यश ,अपना ऐश्वर्य यही है दुनिया फेसबुक नागरिकों की।मंकी बातें कह दीं,लेकिन पलटकर कौन क्या कह रहा है,दूसरा पक्ष क्या है,इसे सुनने ,देखने,पढ़ने की कतई कोई जरुरत नहीं है।लाइक करके छोड़ दीजिये और बाकी कुछभी सोचने समझने की कोई जरुरत नहीं है।

घर परिवार समाज में संवादहीनता का सच है फेसबुक,उसके बाहर की दुनिया से किसी को कोई मतलब नहीं है क्योंकि वह दुनिया मुक्तबाजार है।जहां समता, न्याय, प्रेम, भ्रातृत्व,दांपत्य,परिवार,समाज की कोई जगह नहीं है।बाकी अमूर्त देश है।

इस्तेमाल करो,फेंक दो।स्मृतियों का कोई मोल नहीं है।संबंधों का कोई भाव नहीं है।न उत्पादन है और न उत्पादन संबंध है।बाजार है।कैशलैस डिजिटलहै।तकनीक है।तकनीक बोल रही है और इंसानियत मर रही है।इतिहास मर रहा है और पुनरूत्थान हो रहा है।लोकतंत्र खत्म है और नरसिस महान तानाशाह है।राजकाज फासिज्म है।

2008 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान हमने याहू ग्रुप के अलावा ब्लागिंग शुऱु कर दी थी।तब हम हिंदी में नेट पर लिक नहीं पा रहे थे और गुगल आया नहीं था।हाटमेल,याहू मेल,सिफी और इंडिया टाइम्स,रेडिफ का जमाना था।अंग्रेजी में ही लिखना होता था।समयांतर में तब हम नियमित लिख रहे थे बरसों से।महीनेभर इंतजार रहता था किसी भी मुद्दे पर लिखने छपने का।थोड़ा बहुत इधर उधर छप उप जाता था।तबसे विकास सिर्फ तकनीक का हुआ है।बाकी सबकुछ सत्यानाश है।निजीकरण,ग्लोबीकरण उदारीकरण विनिवेश का जादुई यथार्थ है।

मीडिया तब भी इतना कारपोरेट और पालतू न था।देश भर में आना जाना था। बाराक ओबामा का हमने दुनियाभर में खुलकर समर्थन किया था।

हमारे ब्लाग नंदीग्राम यूनाइटेड में बाकायदा विजेट लगा था अमेरिकी चुनाव के अपडेट साथ ओबामा के समर्थन की अपील के साथ।

शिकागो में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद ओबामा की आवाज में सिर्फ अमेरिका के ख्वाब नहीं थे,रंगभेद,जाति व्यवस्था,भेदभाव और असहिष्णुता के खिलाफ विश्वव्यापी बदलाव के सुनहले दिनों की उम्मीदें थीं।

वायदे के मुताबिक इराक और अफगानिस्तान के तेल कुओं से अमेरिकी सेना को निकालने का काम ओबामा ने अमेरिकी हितों के मुताबिक बखूब कर दिखाया।2008 की भयंकर मंदी से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पटरी  पर लाने के काम में उनने व्हाइट हाउस में आठ साल बीता दिये।जायनी वर्चस्व के खिलाफ वे वैसे ही नहीं बोले जैसे अनुसूचितों,पिछड़ों,सिखों,ईसाइयों और मुसलमानों के चुने हुए लोग मूक वधिर हैं।

ओबामा की विदाई के बाद सवाल यह बिना जबाव का रह गया है कि अश्वेतों की अछूतों को समानता और न्याय दिलाने के ख्वाबों का क्या हुआ।ओबामा ने कहा,वी कैन,वी डिड।चुनाव जीतने और पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने के बाद उन्हेोंने क्या किया,यह पहेली अनसुलझी है।

भारत में गुजरात नरसंहार में अभियुक्त को क्लीन चिट देकर उनसे अंतरंगता के सिवाय भारतीय उपमहाद्वीप को उनके राजकाज से आखिर क्या हासिल हुआ?

अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था को बदलने और अमेरिकी राष्ट्र और सत्ता प्रतिष्ठान पर जायनी वर्चस्व को रोकने में ओबामा सिरे से नाकाम रहे।

पहले कार्यकाल में उनने इजराइल की ओर से अमेरिकी विरोधी,प्रकृति विरोधी मनुष्यता विरोधी मैडम हिलेरी क्लिंटन को विदेश मंत्री बनाया तो दूसरे कार्यकाल में उनके एनडोर्स मेंट से ही हिलेरी डेमोक्रेट पार्टी की राष्ट्रपति उम्मीदवार बनीं।

नतीजा अब इतिहास है।अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन की हार के बाद, द वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा था , 'जिन 700 काउंटियों ने ओबामा का समर्थन करके उन्हें राष्ट्रपति बनाया, उनमें से एक तिहाई डोनाल्ड ट्रंप के खेमे में चले गए। ट्रंप ने उन 207 काउंटियों में से 194 का समर्थन हासिल किया, जिन्होंने या तो 2008 या फिर 2012 में ओबामा का समर्थन किया था'। इसकी तुलना में उन 2200 काउंटियों में जिन्होंने कभी ओबामा का समर्थन नही किया, हिलेरी क्लिंटन को सिर्फ छह का साथ मिल सका। यानी ट्रंप के खेमे से सिर्फ 0.3 फीसद वोट हिलेरी के खाते में आ सके।आप आठ साल तक व्हाइट हाउस में क्या कर रहे थे कि ट्रंप के हक में यह नौबत आ गयी?

आठ साल तक फर्स्ट लेडी रही मिशेल ओबामा की विदाई भाषण में अमेरिका में असहिष्णुता की जो कयामती फिजां बेपर्दा हुई,वह सिर्फ अमेरिका का संकट नहीं है क्योंकि दुनिया कतई बदली नहीं है और न मार्टिन लूथर किंग के ख्वाबों को अंजाम तक पहुंचाने का कोई काम हुआ है।जैसे आजाद भारत में बाबा साहेब अंबेडकर का मिशन है।

युद्धक अर्थव्यवस्था होने की वजह से अमेरिकी जनता की तकलीफें ,उनकी गरीबी और बेरोजगारी में निरंतर इजाफा हुआ है।यह संकट 2008 की मंदी की निरंतरता ही कही जानी चाहिए।दूसरी तरफ यह संकट अब विश्वव्यापी है क्योंकि दुनियाभर की सरकारें,अर्थव्यवस्थाएं व्हाइट हाउस और पेंटागन से नत्थी हैं।

इस पर तुर्रा यह कि भारत में भक्त मीडिया का प्रचार ढाक डोल के साथ यह है कि व्हाइट हाउस से विदाई के बाद भी ओबामा और मोदी के बीच हाटलाइन बना रहेगा।

ओबामा साहेब,मोदी से दोस्ती और हिलेरी के साथ दुनिया बदलने का ख्वाब बेमायने हैं।इस धतकरम की वजह से जाते जाते अमेरिका और दुनिया को डोनाल्ड ट्रंप जैसे धुर दक्षिणपंंथी कुक्लाक्सक्लान के नरसंहारी रंगभेदी संस्कृति के हवाले कर गये आप।दुनिया में वर्ण,जाति रंगभेद का माहौल बदला नहीं,यह भी आप कह गये।

भारत में हिंदुत्व एजंडा और भारत में मनुस्मृति शासन बहाल रखने के तंत्र मंत्र यंत्र को मजबूत बनाते हुए आप कैसे डोनाल्ड ट्रंप को रोक सकते थे,सवाल यह है।

सवाल यह भी है कि भारत और बाकी दुनिया में असहिष्णुता के फासिस्ट राजकाज के साथ नत्थी होकर अमेरिका में फासिज्म को आप कैसे रोक सकते थे?

गौरतलब है कि आठ साल तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा ने आज अपने आखिरी संबोधन में भी महिलाओं, LGBT कम्युनिटी और मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाने के आह्वान के साथ ख़त्म की। ओबामा की ये स्पीच 'Yes We Can' के उसी नारे के साथ ख़त्म हुआ जिससे उनके पहले कार्यकाल के चुनाव प्रचार की शुरूआत हुई थी। ओबामा ने लोगों का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा- "मैंने रोज आपसे सीखा। आप लोगों ने ही मुझे एक अच्छा इंसान और एक बेहतर प्रेसिडेंट बनाया।" बता दें कि उनका कार्यकाल 20 जनवरी को खत्म हो रहा है। इसी दिन डोनाल्ड ट्रम्प नए प्रेसिडेंट के रूप में शपथ लेंगे।

उन्होंने कहा, "हर पैमाने पर अमेरिका आज आठ साल पहले की तुलना में और बेहतर और मजबूत हुआ है।" उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में हारने वाली अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी के मनोबल को बढ़ाने की कोशिश में कहा कि बदलाव लाने की अपनी क्षमता को कभी कम ना आंके। इसका समापन उन्होंने अपने चिरपरिचित वाक्य 'यस वी कैन' (हां, हम कर सकते हैं) से किया।

ओबामा ने स्पीच में कई और खास बातें कही थी। उन्होंने कहा था कि अमेरिका बेहतर और मजबूत बना है। पिछले आठ साल में एक भी आतंकी हमला नहीं हुआ।सीरिया संकट और  तेलयुद्ध के साथ दुनियाभर में आतंकवाद के निर्यात की वजह से दुनियाभर में युद्ध और शरणार्थी संकट के बारे में जाहिर है कि उन्होंने कुछ नहीं कहा। हालांकि उन्होंने कहा कि बोस्टन और ऑरलैंडो हमें याद दिलाता है कि कट्टरता कितनी खतरनाक हो सकती है।

उन्होंने अमेरिकी चुनाव में रूस के हस्तक्षेप के आरोपों के बीच दावा किया कि अमेरिकी एजेंसियों पहले से कहीं अधिक प्रभावी हैं। फिर उन्होंने दुनिया से फिर वायदा किया कि आईएसआईएस खत्म होगा।कड़ी चेतावनी दी है कि अमेरिका के लिए जो भी खतरा पैदा करेगा, वो सुरक्षित नहीं रहेगा।अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के इतिहास के मद्देनजर,खासतौर पर भारत अमेरिका परमाणु संधि और युद्धक साझेदारी के मद्देनजर भारत के लिए भी यह बयान गौरतलब है जो सीधे तौर पर खुल्ला युद्ध का ऐलान है और ट्रंप के या मोदी के युद्धोन्मादी बयानों से कहीं भी अलग नहीं है। गौर करें,ओबामा ने कहा है कि ओसामा बिन लादेन समेत हजारों आतंकियों को हमने मार गिराया है।

भले ही अमेरिका में बहुलता और सहिष्णुता भारत की तरह गंभीर खतरे में है और मिशेल ओबामा ने अपने विदाई भाषण में इसे बेहतर ढंग से इसे रेखांकित भी किया है,अपनी स्पीच में ओबामा ने कहाः मैं मुस्लिम अमेरिकियों के खिलाफ भेदभाव को अस्वीकार करता हूं। मुसलमान भी उतने देशभक्त हैं, जितने हम।ओबामासाहेब आपसे बेहतर कोई नहीं जानता कि आप कितना बड़ा सफेद झूठ बोल रहे हैं।

ओबामा ने कहा कि मुस्लिमों के बारे में कही जा रही बातें गलत हैं। अमेरिका में रहने वाले मुस्लिम भी हमारे जितने ही देशभक्त हैं। उन पर किसी तरह का शक करना गलत है। इसी तरह से महिलाओं और समलैंगिकों इत्यादि के बारे में दुराभाव रखना भी गलत है। अपने चुनाव की चर्चा करते हुए ओबामा ने कहा कि तब विभाजनकारी ताकतें अमेरिका में अश्वेत राष्ट्रपति का लोगों को भय दिखाती थीं। लेकिन उनके चुने जाने के बाद वह भय खत्म हो गया। समाज में ज्यादा एकजुटता और मजबूती आई। वैसा कुछ नहीं हुआ-जिसके लिए देश को डराया जाता था।

बीबीसी के मुताबिकःआठ साल पहले अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा बदलाव और उम्मीद का संदेश लेकर आए थे। आठ साल के बाद अब हवा बदल चुकी है. अमरीका में अब आपसी दरारें और गहरी हो गई हैं। ओबामा के भाषण में बातें तो उम्मीद की, एक बेहतर भविष्य की थी लेकिन काफ़ी हद तक आनेवाले दिनों के लिए एक चिंता की झलक भी थी। शायद इसलिए किसी का नाम लिए बगैर, किसी पर उंगली उठाए बगैर ओबामा ने जनता से अमरीकी लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए सजग रहने की अपील की। आठ बरस पहले ओबामा ने जहां से शुरुआत की थी, वहीं शिकागो में ये विदाई भाषण दिया।

ओबामा ने कहा कि अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण अमेरिका 'ने महामंदी के दौरान फासीवाद के प्रलोभन और अत्याचार का विरोध किया और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अन्य लोकतंत्रों के साथ मिलकर एक व्यवस्था कायम की। ऐसी व्यवस्था, जो सिर्फ सैन्य ताकत या राष्ट्रीय संबद्धता पर नहीं बल्कि सिद्धांतों, कानून के शासन, मानवाधिकारों, धर्म, भाषण, एकत्र होने की स्वतंत्रताओं और स्वतंत्र प्रेस पर आधारित थी।' अपने गृहनगर से जनता को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा, 'उस व्यवस्था के सामने अब चुनौती पेश की जा रही है।

फिरभी बेहतर है कि शिकागो में अमेरिका के राष्ट्रपति पद से विदाई लेते हुए ओबामा काफी भावुक दिखे। उन्होंने कहा, 'अपने घर आकर अच्छा लग रहा है। मैं और मिशेल वापस वहीं लौटना चाहते थे, जहां से यह सब शुरू हुआ था। मिशेल 25 सालों से मेरी पत्नी ही नहीं, मेरी अच्छी दोस्त भी हैं। उनके साथ के लिए शुक्रिया। ट्रंप को सत्ता का यह शांतिपूर्वक हस्तांतरण है। मैं अमेरिकी नागरिकों की इच्छा के अनुसार 4 साल और पद नहीं संभाल सकता। अमेरिका के लोगों को बदलाव लाने के लिए अपनी क्षमता में विश्वास रखना होगा। अपनी फेयरवेल स्पीच में ओबामा ने मिशेल के लिए कहा कि मिशेल, पिछले पच्चीस सालों से आप न केवल मेरी पत्नी और मेरे बच्चों की मां है, बल्कि मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। ओबामा ने अपनी बेटियों मालिया और साशा से कहा कि अद्भुत हैं। भाषण के दौरान बराक ओबामा भावुक हो गये। यह देख उनकी बेटी और पत्नी मिशेल की आंखों में आंसू आ गए।

ओबामा ने अपने विदाई भाषण में कहा कि जब हम भय के सामने झुक जाते हैं तो लोकतंत्र प्रभावित हो सकता है। इसलिए हमें नागरिकों के रूप में बाहरी आक्रमण को लेकर सतर्क रहना चाहिए। हमें अपने उन मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए जिनकी वजह से हम वर्तमान दौर में पहुंचे हैं।

अमेरिका में ट्रंप का अश्वेतों के खिलाफ जिहाद अब अमेरिकी सरकार का राजकाज है तो भारत में हिंदुत्व का पुनरूत्थान है।मनुष्यता के खिलाफ दोनों इजराइल के साथ युद्ध पार्टनर है।

भारत में यह युद्ध हड़प्पा औरर मोहनजोदोड़ो के पतन के बाद लगातार जारी है।अब देश आजाद है। बाबासाहेब के सौजन्य से संविधान बाकायदा धम्म प्रवर्तन है।असल में बौद्धमय भारत का वास्तविक अवसान ब्राह्मणधर्म का पुनरूत्थान है।समता और न्याय के उल्टे भारतीय सत्ता वर्ग वंचित मेहनतकशों को अछूत बताकर इनकी छाया से भी दूर रहने की कोशिश करता है और इस क्रम में उन्हें बुनियादी मानवीय अधिकारों से पूरी तरह वंचित करके लगभग जानवरों जैसी स्थिति में रहने के लिए मजबूर करता है।उसको मिट्टी में मिलाकर उसका वजूद खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।यही रामराज्य है।

कहने की जरुरत नहीं है कि संसद में कानून बनाने से हजारों सालों से चली आ रही मानसिकता नहीं बदली है।बदल भी नहीं सकती क्योंकि संविधान के बदले अब भी मनुस्मृति चल रही है क्योंकि वह पवित्र धर्म है और बहुसंख्य आम जनता की वध्यनियति है। इसलिए आज भी दलित द्वारा पकाए खाने को स्कूल के बच्चों द्वारा न खाने, दलितों को उनकी औकात बताने के लिए उन्हें नंगा करके घुमाने, हिंसा और बलात्कार का शिकार बनाने, उनके घर फूंकने और उनकी सामूहिक हत्या करने की घटनाएं होती रहती हैं,क्योकि पितृसत्ता कायम है और द्रोपदी का चीरहरण जारी है।कैशलैस डिजिटल इंडिया में रोज रोज देश के चप्पे चप्पे पर स्त्री आखेट है।बलात्कार सुनामी है।कही आम जनता की सुनवाई नहीं होती,लोकतंत्र है।

हकीकत यह है कि आजादी के लिए हुए संघर्ष के दौरान,उसे भी पहले नवजागरण के दौरान  जो सामाजिक जागरूकता और आधुनिक चेतना पैदा हुई थी, आज उसकी चमक काफी कुछ फीकी पड़ चुकी है।

पुरखों का सारा  करा धरा गुड़ गोबर है।इतिहास विरासत मिथक हैं।मूर्तिपूजा और कर्म कांड से बाहर कोई यथार्थ हर किसी को नामंजूर है।अखंड कीर्तन जारी है।

शंबूक हत्या का सिलसिला जारी है और संविधान में प्रदत्त वंचितों के लिए तमाम रक्षा कवच, अनेक अधिकार,कायदे कानून  केवल कागज पर ही धरे रह गए हैं। उन पर अमल करने में न तो समाज की ही कोई विशेष रुचि है और न ही राष्ट्र की.राष्ट्र अब रामराज्य है।राष्ट्र अब राममंदिर है।जहां बहुजनों का प्रवेश निषिद्ध है।प्रवेशाधिकार मिला तो बहुजन घुसपैठिये विदेशी हैं।इस सत्ता के आतंक में या फिर इस सत्ता के तिलिस्म में रीढ़ देह से गायब है।रगों में खून नहीं जो खौल जाये और इसीलिए पुरखों के नाम मिशन दुकानदारी है और समता न्याय के आंदोलन अब ठंडे पड़ चुके हैं।

मनुस्मृति के तहत जातिव्यवस्था सख्ती से लागू करने की समरसता है।

जाहिर है कि पारंपरिक रूढ़िग्रस्त चेतना की वापसी हो रही है और इसका प्रमाण खाप पंचायत या उस जैसी ही अन्य पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं का बढ़ रहा प्रभाव है। ये संस्थाएं और संगठन आधुनिकता के बरक्श परंपरा को खड़ा करके परंपरा के संरक्षण की बात करती हैं क्योंकि उनकी राय में उसके साथ संस्कृति और धर्म का गहरा नाता है।देश की राजनीति और देश की सरकार खाप पंचायत है।

हम अमेरिकी उपनिवेश बनकर सचमुच अमेरिका हो गये हैं।

यहां मोदी हैं तो वहां ट्रंप हैं।

यहां भरा पूरा संघ परिवार है तो वह रिपब्लिकन और कुक्लाक्सक्लान हैं।

अमेरिका का सच यह है कि मुसलमान ,शरणार्थी के खिलाफ नये राष्ट्रपति का जिहाद है और जाते हुए राष्ट्रपति  ने अमेरिकी जनता से अपील की कि अमेरिकी मुसलमानों के खिलाफ किसी प्रकार के भेदभाव को नकार दें।

भारत का भी सच यही है।कोई मुसलमानों के साथ हैं तो कोई मुसलमानों के खिलाफ हैं और जिहाद में कोई कमी नहीं है।आदिवासियों,दलितों,पिछड़ों और स्त्रियों का सच यही है।पक्ष विपक्ष की बातें सिर्फ बातें हैं।सूक्तियां हैं और यथार्त विशुध रंगभेद है।नरसंहार का सिलसिला अंतहीन है।अबाध अस्पृश्यता है।सैन्य राष्ट्र है।

ओबामा ने कहा कि बदलाव तभी होता है जब आम आदमी इससे जुड़ता है। आम आदमी ही बदलाव लाता है। हर रोज मैंने लोगों से कुछ न कुछ सीखा। हमारे देश के निर्माताओं ने हमें अपने सपने पूरे करने के लिए आजादी दी। हमारी सरकार ने यह प्रयास किया कि सबके पास आर्थिक मौका हो। हमने यह भी प्रयास किया कि अमेरिका हर चैलेंज का सामना करने के लिए तैयार रहे।

यह ओबामा का अमेरिकी सपना है और हम भारत में सपनों में सपनों का भारत वही जी रहे हैं।बाकी हमारे हिस्से में भोगे हुए यथार्थ का नर्क है।जिसे हम कहीं भी किसी सूरत में रंगकर्म में, माध्यमों में,विधाओं में,मीडिया में,राजनीति में,साहित्य में,लोक में,कलाओं में कहने तक की हिम्मत नहीं रखते क्योंकि सारा कारोबार रंगबिरंगे सपनों का है और मुफ्त में स्वर्ग का चिटफंड वैभव है।संस्कृति विदेशों में शूटिंग है।फैशन शो है।टीवी की सुर्खियों के यथार्थ में जीने की अंधता सार्वभौम है।यही अंधभक्ति है।

बिना अभिव्यकित का यह मूक वधिर विकलांग लोकतंत्र दिव्यदिव्यांग है।

जिसमें सबसे प्यारी चीज हमारी अपनी जनमजात गुलामी है।गुलामगिरि है।

बाराक ओबामा की विदाई के बाद राष्ट्रपति पद संभालने वाले पूत के पांव पालने में झलकने लगे हैं।अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभालने से ठीक 9 दिन पहले प्रेसिडेंट एलेक्ट डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में आर्थिक नीति का खांका रखा। अमेरिका को एक बार फिर महान बनाने के अपने लक्ष्य का पीछा करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने अर्थव्यवस्था में ऑटो, फॉर्मा और डिफेंस सेक्टर में बड़े बदलावों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इन सभी सेक्टर्स में दुनिया को एक बार फिर अमेरिका की बादशाहत कायम होती दिखाई देगी।इसका मतलब भली भांति समझ लें तो बेहतर।

ट्रस्ट गांधी वादी विचारधारा का आधार है।गांधी वादी नहीं है ट्रंप,लेकिन अमेरिका में प्रसिडेंट इलेक्ट डोनाल्ड ट्रंप अपनी पूरी संपत्ति को ट्रस्ट में शिफ्ट करने की योजना पर काम कर रहे हैं। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अपनी पहली प्रेस वार्ता में ट्रंप ने कहा कि भले अमेरिकी संविधान से उनके ऊपर अपने कारोबार से अलग होने की बाध्यता नहीं है, वह ऐसा महज इसलिए कर रहे हैं जिससे कोई उनपर उंगली न उठा सके। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दोनों बेटों के हवाले ट्रंप समूह को करते हुए कहा कि बतौर कारोबारी वह अपनी कंपनी को बेहतर ढ़ंग से चला सकते हैं और साथ ही अमेरिका की सरकार को चला सकते हैं। लेकिन देश के हितों को आगे रखते हुए वह अपनी कंपनी से नाता पूरी तरह से तोड़ लेंगे।बिजनेसमैन राष्ट्रपति के व्हाइटहाउस से जारी फरमानका अंजाम कैसे भुगतेंगे,यह भी समझ लें।हुक्मउदुली भी असंभव है।

मसलन अब डोनाल्ड ट्रंप का संकेत है कि आने वाले दिनों में अमेरिका किसी अन्य देश को अप्रूवल देने से ज्यादा वजन वह अमेरिका में दवाओं की मैन्यूफैक्चरिंग पर देंगे। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा ड्रग्स खरीदता है इसके बावजूद फार्मा सेक्टर में उसका रसूख कम हो रहा है। लिहाजा उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में फार्मा सेक्टर में अमेरिका अक्रामक नीति बना सकता है। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर भारत इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है । जहां ग्लोबल इंडस्ट्री में ग्रोथ लगभग 5 फीसदी के आसपास है।आईटी सेक्टर तो सिरे से अमेरिकी आउटसोर्सिंग पर निर्भर है,जिसे सिरे से खत्म करने पर ट्रंप आमादा है।खेती को ख्तम करके जो मुक्तबाजार बनाया है,नोटबंदी के बाद गहराती मंदी के आलम में उसका जलवा बहार अभी बाकी है।परमाणु ऊर्जा से लेकर रक्षा आंतरिक सुरक्षा अमेरिकी है।

गौर करें कि डोनाल्ड ट्रंप ने उन लोगों को चेतावनी दी है जो अमेरिका से बाहर अपना सामान बनाकर वापस अमेरिका में बेचते हैं। ट्रंप ने कहा कि ऐसी कंपनियों पर सीमा शुल्क लगाया जाएगा। ट्रंप ने कहा ऐसी कंपनियों पर भारी सीमा शुल्क लगया जाएगा। उन्होंने कहा अमेरिका में आप अपनी कंपनी स्थानांतरित कर सकते हैं अगर वह अमेरिका के अंदर है तो मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अमेरिका में कई ऐसे स्थान हैं। इससे पहले ट्रंप ने टोयोटा, जनरल मोटर्स जैसी कंपनियों को कारखाने अमेरिका में स्थानांतरित करने को लेकर दबाव बनाया गया था।

गौरतलब है कि अमेरिका और मैक्सिको के बीच तनाव बढ़ने के संकेत मिलने लगे हैं. मैक्सिको के राष्ट्रपति एनरिके पेना नीटो ने साफ़ कर दिया है कि उनका देश अमेरिका द्वारा सीमा पर दीवार बनाए जाने का समर्थन नहीं करता है और वह इसके लिए किसी तरह की वित्तीय सहायता भी नहीं देगा। पेना नीटो ने यह बात डोनाल्ड ट्रंप के बुधवार को आए उस बयान के जवाब में कही है जिसमें ट्रंप ने मैक्सिको की सीमा पर दीवार बनाए जाने की बात दोहराई थी। गुरूवार को मैक्सिको सिटी में देश के राजदूतों को संबोधित करते हुए पेना नीटो ने कहा कि मैक्सिको अपने पड़ोसी देश के साथ बेहतर संबंध चाहता है।

इसके साथ ही निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर आज सनसनीखेज दावे सामने आए जिनमें कहा गया है कि उनको रूस ने कई वर्षों से 'तैयार' किया है। मॉस्को के पास उनको लेकर नितांत व्यक्तिगत सूचना है। वहीं ट्रंप ने इस दावे को खारिज करते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और कहा कि यह नाजी जर्मनी में रहने जैसा है। एफबीआई और सीआईए समेत अमेरिका की चार प्रमुख खुफिया एजेंसियों ने ट्रंप और निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा के समक्ष पिछले सप्ताह, वर्ष 2016 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में रूसी हस्तक्षेप पर एक रिपोर्ट पेश की थी जिसमें इन आरोपों का जिक्र था।

इस बीच यूएस नैशनल इंटेलिजेंस काउंसिल की ग्लोबल ट्रेंड्स रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की इकॉनमी सुस्त पड़ रही है, जबकि भारत की ग्रोथ तेज बनी हुई है। हालांकि, भारत में सामाजिक गैर-बराबरी और धार्मिक टकराव से इकॉनमी पर बुरा असर पड़ सकता है। यह रिपोर्ट चार साल में एक बार आती है।

इसमें बीजेपी सरकार की हिंदुत्व नीति से देश के अंदर और पड़ोसी देशों के साथ टकराव बढ़ने की ओर ध्यान दिलाया गया है। रिपोर्ट में लिखा है, 'भारत की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी हिंदुत्व को सरकारी नीतियों का हिस्सा बनाने को कह रही है। इससे देश में मुस्लिम अल्पसंख्यकों से टकराव बढ़ रहा है। इससे मुस्लिम बहुल पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ भी तनाव बढ़ रहा है।'

अमेरिकी रिपोर्ट में उन महत्वपूर्ण ट्रेंड्स की पहचान की जाती है, जिनका आने वाले 20 वर्षों में दुनिया पर असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि टेक्नॉलजी से दुनिया काफी करीब आ गई है, लेकिन इससे आइडिया और पहचान को लेकर मतभेद बढ़ सकते हैं जिससे पहचान की राजनीति को बढ़ावा मिलेगा। रिपोर्ट में कहा गया है, 'भारत हिंदू राष्ट्रवादियों से कैसे निपटता है और इजरायल धार्मिक कट्टरपंथ के साथ किस तरह से संतुलन बनाता है, इससे भविष्य तय होगा।' रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले वर्षों में आतंकवाद का खतरा बढ़ेगा। इस संदर्भ में भारत में 'हिंसक हिंदुत्व' के अलावा 'उग्र क्रिश्चियनिटी और इस्लाम' का जिक्र किया गया है। सेंट्रल अफ्रीका के देशों में ईसाई धर्म का उग्र चेहरा दिख रहा है। वहां इस्लाम का भी एक ऐसा ही चेहरा है। म्यांमार में उग्र बौद्ध और भारत में उग्र हिंदुत्व है। इससे आतंकवाद को हवा मिलेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद और अस्थिरता बनी रहेगी, जबकि भारत छोटे दक्षिण एशियाई देशों को इकनॉमिक ग्रोथ में हिस्सेदार बना सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को पाकिस्तान से रक्षा संबंधी खतरे हो सकते हैं, जो परमाणु हथियार बढ़ा रहा है। वह इनके लिए डिलीवरी प्लैटफॉर्म पर भी तेजी के काम कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान टैक्टिकल परमाणु हथियार और समुद्र से मार करने वाली मिसाइलें तैयार कर रहा है। अगर वह समुद्र में परमाणु हथियार तैनात करता है तो उससे पूरे क्षेत्र के लिए सुरक्षा संबंधी खतरा पैदा होगा।

आगे दूसरे विश्वयुद्ध में आखिरकार देखी मंदी है और फिर वही भुखमरी है।

उसके नजारे पर भी तनिक गौर करें।मीडिया से साभार

73 साल पहले बंगाल (मौजूदा बांग्लादेश, भारत का पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा) ने अकाल का वो भयानक दौर देखा था, जिसमें करीब 30 लाख लोगों ने भूख से तड़पकर अपनी जान दे दी थी। ये सेकंड वर्ल्ड वॉर का दौर था। माना जाता है कि उस वक्त अकाल की वजह अनाज के उत्पादन का घटना था, जबकि बंगाल से लगातार अनाज का एक्सपोर्ट हो रहा था। हालांकि, एक्सपर्ट्स के तर्क इससे अलग हैं। अकाल से ऐसे थे हालात…

राइटर मधुश्री मुखर्जी ने उस अकाल से बच निकले कुछ लोगों को खोज उनसे बातचीत के आधार पर अपनी किताब में लिखा है कि उस वक्त हालात ऐसे थे कि लोग भूख से तड़पते अपने बच्चों को नदी में फेंक रहे थे। न जाने ही कितने लोगों ने ट्रेन के सामने कूदकर अपनी जान दे दी थी। हालात ये थे कि लोग पत्तियां और घास खाकर जिंदा थे। लोगों में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन करने का भी दम नहीं बचा था। इस अकाल से वही लोग बचे जो नौकरी की तलाश में कोलकाता (कलकत्ता) चले आए थे या वे महिलाएं जिन्होंने परिवार को पालने के लिए मजबूरी में प्रॉस्टिट्यूशन का पेशा शुरू कर दिया।

अनाज की नहीं थी कोई कमी

ये सिर्फ कोई प्राकृतिक त्रासदी नहीं थी, बल्कि ये इंसानों की बनाई हुई थी। ये सच है कि जनवरी 1943 में आए तूफान ने बंगाल में चावल की फसल को नुकसान पहुंचाया था, लेकिन इसके बावजूद अनाज का प्रोडक्शन घटा नहीं था। इस बारे में लिखने वाले ऑस्ट्रेलियन साइंटिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट डॉ. गिडोन पोल्या का मानना है कि बंगाल का अकाल 'मानवनिर्मित होलोकास्ट' था। इसके पीछे अंग्रेज सरकार की नीतियां जिम्मेदार थीं। इस साल बंगाल में अनाज की पैदावार बहुत अच्छी हुई थी, लेकिन अंग्रेजों ने मुनाफे के लिए भारी मात्रा में अनाज ब्रिटेन भेजना शुरू कर दिया और इसी के चलते बंगाल में अनाज की कमी हुई।

रोकी जा सकती थी त्रासदी

जाने-माने अर्थशात्री अमर्त्य सेन का भी मानना है कि 1943 में अनाज के प्रोडक्शन में कोई खास कमी नहीं आई थी, बल्कि 1941 की तुलना में प्रोडक्शन पहले से ज्यादा था। इसके लिए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल को सबसे ज्यादा जिम्मेदार बताया जाता है, जिन्होंने स्थिति से वाकिफ होने के बाद भी अमेरिका और कनाडा के इमरजेंसी फूड सप्लाई के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इन्होंने प्रभावित राज्यों की मदद की पेशकश की थी। जानकारों का कहना है कि चर्चिल अगर चाहते तो इस त्रासदी को रोका जा सकता था। वहीं, बर्मा (मौजूदा म्यांमार) पर जापान के हमले को भी इसकी वजह माना जाता है। कहा जाता है कि जापान के हमले के चलते बर्मा से भारत में चावल की सप्लाई बंद हो गई थी।