Friday, September 23, 2016

Thus, RAFALE deal struck!Thanks to Kashmir! Palash Biswas

Thus, RAFALE deal struck!Thanks to Kashmir!

Palash Biswas

It is unprecedented war campaign making in public opinion at home as well as worldwide for yet another Indo Pak clash in the border. It reminds the pattern of war campaign launched by Bush War Machine activated in United States of America as the corporate media worldwide campaign to build up a false resistance against so called weapons of mass destruction in Iraq to launch the war against the middle east to capture oilfields and resultant in Taliban to ISIS which made entire middle East And Africa subjected to American Spring.

Having signed nuclear deal with India,Bush injected the American Spring in Indian psyche to make Indian ocean peace zone a burning oil field for the survival of US War Economy in turmoil with the burns of wars since Vietnam and which have to be continued at any cost to bring home the dead soldiers and marines or those live dead humanity inflicted with personality disorder.

This war cry is being presented as a consumer product with strategic marketing in media and social media as the offspring of neoliberal reforms divested the unity and integrity of Indian nation, its democracy, its natural and human resources along with everything public including defence and internal security just to serve the interests of the desi videsi companies selling the weapons of mass destruction and we have been subjected to radioactive environment as nuclear plants have become viral in our veins so dangerously.This blind nationalism happens to be most antinational in this sense.

This war cry all on the name of false patriotism is nothing but simple business interests with huge stakes by those praivate companies around the world in the wide open Indian Weapon market.

Unfortunately,Indian people,specifically the people in Kashmir vally,a different demography with majority Muslim population  have to be the victims as well as those human beings across the borders who would be sacrificed in border clash which might well be resolved with diplomatic bilateral exercise.

Those vomiting venom against humanity and nature have not to pay anything,the taxpayers have to pay the bill of commission to be paid as it has been the story of all defence purchase.Millions of people around this geopolitics have to be desettled yet again as the partition holocaust continues. Specifically those,who have to lose their sons converted into martyrs.

No conscience seems to relevant as it was not there anywhere to skip the war in the oilfields and the media misled the humanity.


Media reports:

Rafale fighters are 4.5 generation jets and with the deal for 36 aircraft being signed today, the Indian Air Force's (IAF) combat power will be enhanced significantly. The Rafale fighter jet is equipped to carry out both air-to-ground strikes, as well as air-to-air attacks and interceptions during the same sortie. 


Rafale is an "omni-role" aircraft, with a full-range of advanced weapons such as Meteor Beyond-Visual-Range (BVR) missile, SCALP long-range missile, helmet mount system, AESA (Active Electronically Scanned Array) radar and latest warfare systems.


Dassault Aviation says that the aircraft has the ability to track targets and generate real time three-dimensional maps. It has a wing span of 10.90m; length of 15.30m; and a height of 5.30m.


The digital 'Fly-by-Wire' Flight Control System is aimed at providing longitudinal stability. But, more than anything else, it is the missiles that are integrated on the Rafale that add to the IAF's firepower.



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जन्मशताब्दी वर्ष के मौके पर बिजन भट्टाचार्य के रंगकर्म का तात्पर्य पलाश विश्वास

जन्मशताब्दी वर्ष के मौके पर बिजन भट्टाचार्य के रंगकर्म का तात्पर्य

पलाश विश्वास

भारतीय गण नाट्य आंदोलन ने इस देश में सांस्कृतिक क्रांति की जमीन तैयार की थी, हम कभी उस जमीन पर खड़े हो नहीं सके।लेकिन इप्टा का असर सिर्फ रंग कर्म तक सीमाबद्ध नहीं है। भारतीय सिनेमा के अलावा विभिन्न कला माध्यमों में उसका गहरा अर हुआ है।सोमनाथ होड़ और चित्तोप्रसाद जैसे यथार्थवादी चित्रकारों से लेकर,देवव्रत विश्वास जैसे रवींद्र संगीत गायक,सलिल चौधरी और भूपेन हजारिका जैसे संगीतकार, माणिक बंदोपाध्याय से लेकर महाश्वेता देवी तक जनप्रतिबद्धता और रचनाधर्मिता के मोर्चे पर लामबंदी का सिलसिला उसी इप्टा की विरासत है।

यह भारतीय रंगकर्म और भारतीय सिनेमा में संगीतबद्ध लोक के स्थाई भाव का सर्वव्यापी सौंदर्यबोध है, जो एकमुश्त भारतीय सिनेमा के साथ भारतीय रंगकर्म, भारतीय साहित्य और संस्कृति की जमीन और लोक की जड़ों का रचनासंसार भी है।


बिजन भट्टाचार्य की जन्मशताब्दी के मौके पर पटना के रंगकर्मियों के आयोजन का न्यौता मिला है। लेकिन हम वहां जा नहीं पा रहे हैं।नवारुण भट्टाचार्य और महाश्वेता देवी के साथ दशकों के संवाद के जरिये बिजन भट्टाचार्य के रंगकर्म के अनेक अंतरंग आयाम से उसी तरह आमना सामना हुआ है,जिस तरह ऋत्विक घटक की फिल्मों मेघे ढाका तारा,कोमल गांधार और सुवर्णरेखा के मार्फत रंग कर्म आंदोलन के विस्तार का साक्षात्कार हुआ है।


नवान्न के लेखक,अभिनेता बतौर रवींद्र की नृत्य नाटिकाओं से लेकर ऋत्विक घटक की रचना संसार तक इप्टा के रंगकर्म का जो विशाल विस्तार है,इस मौके पर उसकी चर्चा करना चाहुंगा।यह आलेख थोड़ा लंबा हो जाये,तो पाठक माफ करेंगे।हम नहीं जानते कि इस आयोजन में कितने लोगों तक यह आलेख पूरा का पूरा पहुंच सकेगा,लेकिन हिंदी में भारतीय पाठकों को अपनी परखौती की इस विरासत को शेयर करने के लिए इस हम अपने ब्लागों पर भी साझा कर रहे हैं।हमारा भी नैनीताल में युगमंच और गिरदा के जरिये,फिर शिवराम जैसे नुक्कड़ रंगकर्मी के जरिये सत्तर के दशक में रंगकर्म से थोडा़ नाता रहा है तो कोलकाता में नांदीकार के साथ भी थोड़ा रिश्ता रहा है तो बिजन भट्टाचार्य के परिजनों को भी दशकों से बहुत नजदीक से जानना हुआ है।हम चाहेंगे कि रंगकर्म और साहित्य संस्कृति से जड़ि पत्रिकाएं इस पूरे आलेख को पाठकों तक पहुंचाने में हमारी मदद करें ताकि बिजन भट्टाचार्य के बहाने हम भारतीय रंग कर्म और कलामाध्यमों का एक संपूर्ण छवि नई पीढ़ियों के समाने पेश कर सकें।

पहले इस तथ्य पर गौर करें कि भारतीय रंगकर्म की मौजूदा संरचना और उसी शैली, कथानक, सामाजिक यथार्थ में विभिन्न कलाओं के विन्यास की जो संगीबद्धता है,उसकी शुरुआत नौटंकी और पारसी थिएटर की देशज विधाओं की नींव पर नाट्यशास्त्र और संस्कृत नाटकों की शास्त्रीय विशुद्ध नाट्य परंपरा के विपरीत रवींद्र नाथ के भारततीर्थ की विविधता और बहुलता वाली राष्ट्रीयता में रची बसी उनकी नृत्य नाटिकाओं से शुरु है।भारतीय नाटकों में संस्कृत और देशज नाटकों में नृत्यगीत बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं,लेकिन रवींद्र नाथ ने नाटक की समूची संरचना और कथानक का विन्यास नृत्य गीत के माध्यम से किया है।बिजन भट्टाचार्य के लिखे नाटक नवान्न ने नृत्यगीत की उस शास्त्रीय तत्सम धारा को अपभ्रंश की लोक जमीन में तोड़कर अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम बतौर नाटक की जमीन तैयार की।जिसमें इप्टा आंदोलन के मंच से चित्रकला, साहित्य की विभिन्न धाराओं का समायोजन हुआ है और आधुनिक रंगकर्म में उन सभी धाराओं को हम एकमुश्त मंच पर बहते हुए देख सकते हैं।

रवींद्र नृत्य नाटिकाओं में चंडालिका,विसर्जन,चित्रांगदा,रक्करबी आधुनिक रंगकर्म के लिए तत्सम संस्कृत के वर्चस्व के बावजूद उसीतरह सामाजिक यथार्थ को सोंबोधित है जैसे मुक्तिबोध की भाषा और शिल्प,निराला के छायावाद की नींव पर आधुनिक हिंदी साहित्य के जनप्रतिबद्ध यथार्थवाद का विस्तार हुआ है।रवींद्र के इन चारों नृत्यनाटिकाओं में नृत्य के ताल में छंदबद्ध कविताओं के मार्फत स्त्री अस्मिता, अस्पृश्यता के खिलाफ बुद्धमं सरणमं गच्छामि और पराधीन भारत की स्वतंत्रतता की मुक्ति आकांक्षा का जयघोष है।चंडालिका,चित्रांगदा और नंदिनी तीनों मुक्ति संग्राम में नेतृत्वकारी भूमिका में है।

इसी सिलसिले में तत्सम से अपभ्रंश की लोक जमीन पर इप्टा आंदोलन के तहत भारतीय थियेटर का सामाजिक यथार्थ पर केंद्रित भारतीय रंगकर्म और संस्कृति कर्म का नया सौंदर्यबोध बना है, जिसे मार्क्सवादी सौंदर्यबोध से जोड़कर हम अपने लोक जीवन की मेहनतकश दुनिया के कला अनुभवों को ही नजरअंदाज करते हैं।बिजन भट्टाचार्य से वह शुरुआत हुई जब भारतीय रंगकर्मियों ने लोक जीवन को रंगकर्म का मुख्य विन्यास,संरचना और माध्यम बनाने में निरंतर काम किया है। भारतीय कला माध्यमों की समग्र समझ  के साथ भारतीय रंगकर्म को देखने परखने के लिए बिजन भट्टाचार्य को जानना इसलिए बेहद जरुरी है।

नया रंगकर्म और रंगकर्म के नये प्रयोगों के लिए बिजन भट्टाचार्य का पाठ महाश्वेता देवी और नवारुण भट्टाचार्य के पाठ से ज्यादा जरुरी है।बिजन के बाद उनके ग्रुप थिएटर का निर्देशन करने वाले उनके बेटे नवारुण दा की मृत्यु उपत्यका में फिर वही नवान्न की भुखमरी की चीखें हैं तो अरबन लेखक नवारुण के उपन्यासों में फिर अंडरक्लास, अछूत, असभ्य, जातिहीन,अंत्यज सर्वहारा फैताड़ु या हर्बर्ट का धमाका गुलिल्ला युद्ध शब्द दर शब्द है।नवारुण दा और महाश्वेता दी के लेखन में वही फर्क है,जो ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों में है।यह रंगकर्म के अनुभव का फर्क है जो नीलाभ या मंगलेश डबराल,वीरेन डंगवाल या गिरदा को दूसरे कवियों से अलग खड़ा कर देता है।

नवान्न के बिजन भट्टाचार्य और ऋत्विक घटक की युगलबंदी से सामाजिक यथार्थ की संगीदबद्ध सिनेमा का भी विकास हुआ जो दो बीघा जमीन  की कथा से अलहदा है।लोक को रंगकर्म का आधार बनाने का मुख्य काम बिजन भट्टाचार्य के नवान्न से ही शुरु हुआ जो गिरदा के नाट्य प्रयोगों में कुमांयूनी और गढ़वाली लोक जीवन है तो हबीब तनवीर के नया थिएटर में फिर वही छत्तीसगढ़ी नाचा गम्मत के साथ तीखा परसाईधर्मी व्यंग्य है तो मणिपुर में इस धारा में मणिपुरी नृत्य और संगीत के साथ साथ मार्शल आर्ट का समावेश है।शिवराम से लेकर सफदर हाशमी की नुक्कड़ यात्रा में भी वही लोक जमीन ही रंगकर्म की पहचान है।

बिजन भट्टाचार्य की पत्नी महाश्वेता देवी थीं।महाश्वेता देवी के चाचा थे ऋत्विक घटक और महाश्वेता देवी के साथ बिजन भट्टाचार्य का विवाह टूट गया तो महाश्वेता देवी ने दूसरा विवाह कर लिया। नवारुण अपनी मां के साथ नहीं थे और वह अपने रंगकर्मी पिता के साथ थे।नवारुणदा ने मेघे ठाका तारा से लेकर सुवर्ण रेखा तक भारत विभाजन की त्रासदी को बिजन और ऋत्विक के साथ जिया है लेकिन अपने रचनाकर्म में छायावादी भावुकता के बजाय चिकित्सकीय चीरफाड़ नवारुणदा की खासियत है और बिजन और ऋत्विक की संगीतबद्धता की बजाय ठोस वस्तुनिष्ठ गद्य उनका हथियार है, लेकिन शुरु से लेकर आखिर तक नवारुणदा उसी नवान्न की जमीन पर खड़े हैं और भद्र सभ्य उपभोक्ता नागरिकों के साथ नहीं,मेहनतकश दुनिया के हक हकूक के साथ वे खड़े हैं लगातार लगातार शब्द शब्द युद्ध रचते हुए तो नवान्न में साझेदार महाश्वेता दी की रचनाओं में शहरी सीमेंट के जंगल के बजाय तमाम जंगल के दावेदार हैं,आदिवासी किसान विद्रोह का सारा इतिहास है और वह हजार चौरसवीं की मां से लेकर महाअरण्य की मां या सिंगुर नंदीग्राम जंगलमहल लोधा शबर की मां भी है।महाश्वेता दी रचनाकर्मी जितनी बड़ी हैं उससे बड़ी सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता है और वे विचारधारा के पाखंड को तोड़कर भी आखिरतक जंगल की गंध से अपनी वफा तोड़ती नहीं हैं।

सविताजी और मुझे उन्हीं महाश्वेता देवी के एकांत में उनके कंठ से दशकों बाद नवान्न के वे ही गीत सुनने को मिले हैं। पारिवारिक संबंध जैसे भी रहे हों,मेहनतकशों के हक हकूक की लड़ाई में नवान्न का रंगकर्म उनका हमेशा साझा रहा है।यही इप्टा को लेकर कोमल गांधार के विवाद और रंगकर्म पर नेतृत्व के हस्तक्षेप के खिलाफ ऋत्विक, देवव्रत विश्वास,सोमनाथ होड़ वगैरह की बगवात की कथा व्यथा भी है।यह कथा यात्रा भी सर्वभारतीय है,जिसमें भारतीय सिनेमा और उसके बलराज साहनी,एके हंगल जैसे तमाम चमकदार चेहरे भी शामिल हैं।

नवान्न बिजन भट्टाचार्य ने लिखा और 1944 में भारतीय गण नाट्य संघ(इप्टा) ने किंवदंती रंगकर्मी शंभू मित्र के निर्देशन में इस नाटक कामंचन भुखमरी के भूगोलको संबोधित करते हुए लिखा है।बाग्ला ग्रुप थिएटर आंदोलन की कथा जैसे शंभू मित्र के बिना पूरी नहीं होती तो बिजन की चर्च के बिना वह कहानी  फिर अधूरी है।इन्हीं शंभू मित्र ने फिर राजकपूर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म जागते रहो का निर्देशन किया।वहा भी मैं क्या झूठ बोल्या की गूंज राजकपूर और नर्गिस के करिश्मा से बढ़कर है और यह फिल्म इसीलिए महान है।भुखमरी के इसी भूगोल से सोमनाथ होड़ और चित्तोप्रसाद की चित्रकला जुड़ी है तो देवव्रत विश्वास के रवींद्र संगीत में भी भूख का वही भूगोल है जो माणिक बंद्योपाध्या का समूचा कथासंसार है।जो दरअसल रवींद्र की चंडालिका, रक्तकरबी और चित्रांगदा का भाव विस्तार है तो नया थिएटर से लेकर मणिपुरी थिएटर का बीज है और इसी परंपरा में मराठी रंगकर्म में तमाशा जैसे लोक विधा का समायोजन है तो दक्षिण भारतीय रंगकर्म में शास्त्रीय नृत्य भारत नाट्यम और कथाकलि विशुध लोक के साथ एकाकार हैं।

1944 में शंभू मित्र के निर्देशन में गणनाट्य संघ की प्रस्तुति के बाद 1948 में आजाद भारत में शंभू मित्र के ग्रुप थिएटर बहुरुपीके मच से कुमार राय के निर्देशन में फिर नवान्न का मंचन हुआ।ब्रिटिश भारत के बंगाल में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक भी मृत्यु बमवर्षा से न होकर लाखों लोग खामोशी से भुकमरी के शिकार हो गये।1943  की बंगाल की उस भुखमरी के शिकार लोगों की मदद के लिए इप्टा ने वायस आप बेंगल उत्सव के जरिये देशभर में एक लाख रुपये से बड़ी रकम इकट्ठा की थी। नवान्न सिर्फ नाटक का मंचन नहीं था,वह सामाजिक यथार्थ का कला के लिए कला जैसा कला कौशल भी नहीं था,भुखमरी के शिकार लोगों के लिए देशव्यापी राहत सहायता अभियान भी था वह ,जो इप्टा का सामाजिक क्रांति उपक्रम था,जिसमें सारे कला माध्यमों का संगठनात्मक ताना बाना था,जो पराधीन भारत में बना लेकिन भारत के आजाद होते ही टूटकर बिखर गया।इप्टा से नवान्न का बहुरुपी के मंच तक स्थानांतरण इसी विघटन का प्रतीक है।


बिजन भट्टा चार्य जितने बड़े लेखक थे,उससे कहीं ज्यादा सशक्त वे थिएटर और सिनेमा दोनों विधायों के अभिनेता थे।बांग्ला थिएटर आंदोलन में गिरीश चंद्र भादुडी़ के बाद त्रासदी जिनके नाम का पर्याय है,वे बिजन भट्टाचार्य है,जिन्होंने मेघे ढाका तारा में नीता के पिता की भूमिका अदा किया है तो विभाजन की त्रासदी को नाटक दर नाटक, फिल्म दर फिल्म भुखमरी की नर्क यंत्रणा के साथ जिया है,नवारुण दा ने उस पिता का हाथ कभी नहीं छोड़ा और यही उनकी आजीवन त्रासदी का सुखांत कहा जा सकता है।

विजन भट्टाचार्य और ऋत्विक घटक हमारी तरह ही पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ित विस्थापित थे, जिन्हें उनकी सक्रिय रचनाधर्मिता और भारतीय संस्कृति,रंगकर्म और सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के बावजूद  बंगाली भद्रलोक समाज ने कभी मंजूर नहीं किया।

ऋत्विक को बाकायदा बंगाल के इतिहास भूगोल से पूर्वी बंगाल से आये बंगाली विभाजनपीड़ितों की तरह  खदेड़ दिया गया और बिजन भट्टाचार्य लगभग गुमनाम मौत मरे और बंगाल के सांस्कृतिक जगत में उनकी जन्मशताब्दी को लेकर वह हलचल नहीं है, जो बंगाल के किसी भी क्षेत्र में कुछ भी करने वाले किसी की भी जन्मशताब्दी को लेकर दिखती है।बल्कि यूं कहे कि बंगाली भद्रसमाज को भूख के भूगोल के इस महान शरणार्थी कलाकार की कोई याद नहीं आती वैसे ही जैसे उन्हें ऋत्विक घटक कभी रास नहीं आये।


हमारे पुरखे जैशोर जिले में रहते थे जो मधुमति नदी के किनारे नड़ाइल थाना इलाके के वाशिंदा थे और वे हरिचंदा ठाकुर के मतुआ आंदोलन से लेकर तेभागा तक के सिपाही थे।वह नड़ाइल अब अलग जिला है।मधुमति नदी भी सूख सी गयी है ,बताते हैं।उसी मधुमति नदी के उस पार फरीदपुर जिले के खानखानापुर में 1906 को बिजन भट्टाचार्य का जन्म हुआ था।उनके पिता क्षीरोद बिहारी स्कूल शिक्षक थे।पेशे के लिहाज से बदली होते रहने के कारण बंगाल भर में पिता के साथ सफर करते रहने की वजह से बंगाल के विबिन्ऩ इलाकों के लोकत में उनकी इतनी गहरी पैठ बनी।उनके लिखे में इसलिए भद्रलोक तत्सम भाषा के बजाय बोलियों के अपभ्रंश ज्यादा हैं,जिन्हें उन्होंने नवान्न मार्फत भारतीय रंगकर्म का सौंदर्यशास्त्र बना दिया।


नवान्न के बारे में बिजन भट्टाचार्य ने खुद कहा है,आवेग न हो तो कविता का जन्म नहीं होता-संवेदना न हो,जीवन यंत्रणा न हो तो शायद कोई रचना संभव नहीं है।


इसतरह गणनाट्य आंदोलन भी दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत संघ पर हिटलर के हमले की वजह से शुरु फासीवादविरोधी आंदोलन के तहत फासीवाद विरोधी लेखक संसकृतिकर्म संगठन से लेकर इप्टा तक का सफर रहा है।1943 की भुखमरी के मुश्किल हालात के मुकाबले समस्त कला माध्यमों के समन्वय से ही इस आंदोलनका इतना व्यापक असर भारतीय विधाओं और कला माध्यमों पर हुआ,जिसके लिए नवान्न का मंचन प्रस्थानबिंदू रहा है।







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Wednesday, September 21, 2016

भारतीय रेल के लाइफ लाइन वजूद पर सवालिया निशान पलाश विश्वास

भारतीय रेल के लाइफ लाइन वजूद पर सवालिया निशान

पलाश विश्वास

indian railway के लिए चित्र परिणाम

रेल बजट का अवसान नवउदारवादी अर्थशास्त्री विवेक देवराय की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के मुताबिक हुआ है।देवराय नीति आयोग के सदस्य हैं।वे सिंगुर नंदीग्राम प्रकरण में वाम सरकार के खास सलाहकार थे,जिन्होंने डा.अशोक मित्र के सामाजिक अर्थशास्त्र से वामदलों के संबंध तड़ने में बड़ी भूमिका निभाई और बाकी इतिहास सबको मालूम है।हालांकि मीडिया के मुताबिक यह अर्थ व्यवस्था में सुधार की दिशा में  बहुत बड़ी छलांग है।


होगाो,इसमें दो राय नहीं।ब्रिटिश हुकूमत के बाद आजाद भारत में भी भारतीय रेल की देश की अर्थव्यवस्था में भारी योगदान रहा है और अर्थव्वस्था का समारा ढांचा ही भारतीय रेल से नत्थी रहा है।उसे तोड़कर कार्पोरेट अर्थव्यवस्था किसी राकेट की तरह हो सकता है कि हमें मंगल या शनिग्रह में बसा दें। लेकिन इसका कुल मतलब यह हुआ कि रेल अब सार्वजनिक परिवहन या देश की लाइफ लाइन या अर्थ व्यवस्था का बुनियादी ढांचा जैसा कोई वजूद भारतीय रेल का बिल्कुल नहीं रहने वाला है।


शिक्षा, चिकित्सा, ऊर्जा, बैंकिंग, बीमा,भोजन,पेयजल,आपूर्ति,सार्वजनिक निर्माण के निजीकरण के बाद भारतीय रेलवे के निजीकरण की दिशा में यह बहुत बड़ी छलांग है।


गौरतलब है कि 1923 में ब्रिटिश हुकूमत के अंतर्गत रेल बोर्ड के नये सिरे से गठन के साथ अलग रेल बजट की सिफारिश विलियम मिशेल ऐकओवार्थ कमिटी ने की थी। जिसके तहत 1924 से बजट के अलावा अलग रेल बजट का सिलसिला शुरु हुआ जो बहुत अरसे से मूल बजट से कहीं बड़ा हुआ करता था।


आजाद भारत में बजट भारी बना शुरु हुआ और बेतहाशा बढ़ते रक्षा खर्च,सड़क परिवहन, ईंधन व्यय और संरचना व्यय के मुकाबले भारतीय रेल के लिए अब बजट का कुल चार प्रतिशत ही खर्च हो पाता है।जबकि शुरुआत में भारतीय अर्थव्यवस्था भारतयी रेल को केंद्रित रही है और लंबे अरसे तक बजट का 75 से 80 फीसद भारतीय रेलवे पर खर्च होता रहा है,जो अब चार फीसद तक सिमट गया है।


अब भारतीय अर्थव्यवस्था कमसकम रेलवे पर निर्भर नहीं है।कच्चे माल की ढुलाई और सार्वजनिक परिवहने के सड़क परिवहन के विकल्प का हाईवे संस्कृति में बहुत विकास होता रहा है तो आम जनता की आवाजाही की,उनके रोजमर्रे की जिंदगी और आजीविका के सिलसिले में रेलवे की भूमिका 1991 से लगातार खत्म होती जा रही है और सार्वजनिक उपक्रम की बजाय रेलवे अब किसी कारपोरेट कंपनी की तरह मुनाफा वसूली का उपक्रम बनता रहा है। जिसका लोक कल्याण या देश की लाइफ लाइन के कोई नाता नहीं रह गया है।उसके नाभि नाल का संबंध भारतीय जनगण से नहीं, बल्कि शेचर बाजार में दांव पर रखे कारिपोरेट हितों के साथ है।


वैसे भी भारतीय संसद की नीति निर्माण में कोई निर्णायक भूमिका  रह नहीं गयी है और नवउदारवाद की वातानुकूलित संतानें कारपोरेट हितों के मुताबिक विशेषज्ञ कमिटियों के मार्फत नीतियां तय कर देती हैं और भारत सरकार सीधे उसे लागू कर देती है,जिसमें संसद की कोई भूमिका होती नहीं है।


रेल बजट के खात्मे के साथ सुधार का संबंध यही है कि रेलवे को सीधे बाजार के कारपोरेट हितों से जोड़ दिया जाये और मनाफावसूली भी किसी कारपोरेट कंपनी की तरह हो।रेलवे पर जनता के सारे हक हकूक एक झटके से खत्म कर दिये जायें।


रेल सेवाओं के लगातार हो रहे अप्रत्यक्ष निजीकरण की वजह से इस मुनाफ वसूली में कारपोरेट हिस्सेदारी बहुत बड़ी है।रेलवे के उस मुनाफे से देश की आम जनता को कोई लेना देना उसी तरह नहीं होने वाला है,जैसे मौजूदा भारतीय रेल का आम जनता के हितों से उतना ही लेना देना है,जितना किसी नागरिक की क्रय क्षमता से है।आम जनता की आवाजाही या देश जोड़ने के लिए नहीं,जो जितना खर्च कर सके,भारतीय रेल की सेवा आम जनता के लिए उतनी तक सीमित होती जा रही है।


जाहिर है कि भारतीय रेल में गरीबों के लिए अब कोई जगह उसी तरह नहीं बची है जैसे आम जनता के लिए चमकदार वातानुकूलित तेज गति की ट्रेनों में उनके लिए जनरल डब्बे भी नहीं होते।कुल मिलाकर,गरीबों के लिए रेलवे हवाी यात्रा की जैसी मुश्किल और खर्चीली होती जा रही है।अब संसद से भी रेल का नाता टूट गया है।


इस देश की गरीब आम जनता की लाइफ लाइन बतौर जिसतरह भारतीय रेल का इतिहास रहा है,वह सारा किस्सा खत्म है।अब भारतीय रेल स्मार्ट, बुलेट, राजधानी, दुरंतो, शताब्दी या पैलेस आन व्हील जैसा कुछ है,जो लोहारदगा रेलगाड़ी,कोंकन रेलवे जैसी मीठी यादों कोसिरे से दफन करने लगी है।


कारपोरेट बंदोबस्त करते हुए रेलवे के अभूतपूर्व  व्तार और विकास के मुकाबले रेल कर्मचारियों की संख्या सत्रह लाख से घटते घटते बहुत तेजी से दस लाख तक सिमट जाने वाली है और इसे अंततः चार लाख तक कर देने की योजना है।रेलबजट के बहाने भारतीय संसद में जो भारतीय रेल की दशा दिशा पर बहसें होती रही हैं और कुछ हद तक जनसुनवाई जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिये कमोबेश होती  रही है,वह सिलसिला जाहिर है कि अब बंद है।


भारतीय रेल पर रेल बजट के अवसान के बाद संसद में या सड़क पर किसी सार्वजनिक बहस की फिर कोई गुंजाइश रही नहीं है।


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Thursday, September 15, 2016

Hastakshep:महत्वपूर्ण खबरें और आलेख रामदेव को जमीन देने के लिए आदिवासियों को उजाड़ता कथित वीडियो हो गया वायरल

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